फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Panchkula News: प्रजनन केंद्र के 25 गिद्ध खुले आसमान में करेंगे विचरण, नजर रखने के लिए पैरों में बांधा जाएगा जीएसएम

विज्ञापन
प्रजनन केंद्र में बैठा गिद्ध। संवाद 
विज्ञापन
पंचकूला। पिंजौर के गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र से 17 दिसंबर को स्वच्छता के दूत कहे जाने वाले 25 गिद्धों को छोड़ने की तैयारी चल रही है। प्रजनन केंद्र से छोड़ने से पहले गिद्धों के पैरों में जीएसएम (ग्लोबल सिस्टम ऑफ मोबाइल कम्युनिकेशन) बांधा जाएगा। जिससे गिद्धों की लोकेशन की जानकारी मिलती रहे। इन गिद्धों पर 100 किलोमीटर के दायरे में नजर रखी जाएगी और इनकी जांच होगी। हर साल यहां से गिद्धों के 20 से 40 के बीच जोड़ों को छोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। अभी प्रजनन केंद्र में गिद्धों की संख्या 380 है। पिंजौर के प्रजनन केंद्र में गिद्धों का कुनबा बढ़ना पर्यावरण संरक्षण के लिए शुभ संकेत माना जाता है। साल 1990 के बाद से भारत में इनकी प्रजाति लुप्त होती गई। पक्षियों की इस प्रजाति को बचाने के लिए ही पिंजौर में संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र खोला गया था। प्रदेश के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और कैबिनेट मंत्री राव नरबीर सिंह गिद्धों को खुले आसमान में छोड़ेंगे।
विज्ञापन

सफेद दुम वाले गिद्ध छोड़े जाएंगे
साल 2004 में पिंजौर में प्रजनन केंद्र स्थापित किया गया था। सबसे पहले केंद्र में दो अंडे लाकर इनक्यूबेटर में रखकर उनसे बच्चे निकाले गए। 20 सालों में गिद्धों की संख्या बढ़कर 380 पहुंच गई है। पिंजौर से सफेद दुम वाले गिद्ध छोड़े जाएंगे। साल 2015 में इसी प्रजनन केंद्र में आठ गिद्धों को रखा गया था और करीब पांच वर्षों बाद 2020 में उन्हीं आठ गिद्धों को एशिया के पहले जिप्सवल्चर रिइंट्रोडक्शन प्रोग्राम के तहत रिहा कर प्राकृतिक माहौल में छोड़ा गया था। रिसर्च और अन्य जानकारी जुटाने के लिए पिंजौर गिद्ध प्रजनन केंद्र ने जनवरी 2024 में 20 व्यस्क गिद्धों को महाराष्ट्र फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को सौंपा था। चार विशेष वाहनों में महाराष्ट्र फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के अधिकारी और रिसर्च टीम इन गिद्धों लेकर गए थे। इनमें दस लंबी चोंच और दस सफेद पीठ वाले गिद्ध शामिल थे।

2001 में गिद्धों के संरक्षण के लिए हुई थी, कार्यक्रम की शुरुआत
साल 2001 में गिद्धों के संरक्षण के लिए कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी। अध्ययन किए गए थे कि गिद्धों की प्रजाति विलुप्त होने का क्या कारण हैं। अध्ययन के निष्कर्ष में पाया गया कि पशुओं के लिए डाइक्लोफिनेक दवा का उपयोग प्रतिबंधित है। पशुओं को दर्द और सूजन में इस दवा का टीका दिया जाता है। टीका देने के बाद किसी कारणवश 72 घंटे के अंदर मवेशी की मृत्यु हो जाती है तो मवेशी के शव को खाने पर उसमें मौजूद डाइक्लोफिनेक के अवशेष गिद्धों में चले जाते हैं। उसके बाद गुर्दे खराब होने की वजह से गिद्धों की मृत्यु हो जाती है।
विज्ञापन


मादा गिद्ध साल में केवल एक ही अंडा देती है
मादा गिद्ध साल में केवल एक ही अंडा देती है, लेकिन उन्होंने अपने केंद्र में उनसे दो अंडे प्राप्त करने में सफलता हासिल की है। केंद्र में गिद्धों की तीन कॉलोनियां बनाई गई हैं। प्रत्येक में 15 से 20 घोंसले हैं, जिनमें रखे गिद्धों के जोड़े वर्ष में एक बार अंडा देते हैं, जिन्हें डॉक्टर व रिसर्च टीम उठा लेती है। 15 दिन में मादा गिद्ध दूसरा अंडा दे देती है। उठाए अंडों को सबसे पहले इनक्यूबेटर (ऊष्मा यंत्र) में लगभग 60 दिनों तक रखा जाता है, जिसमें से चूजे निकल आते हैं। जबकि गिद्ध प्राकृतिक तौर पर अंडों को सेने का कार्य 2-3 सप्ताह में पूरा कर लेती है, जिससे चूजों के बचने की संभावना अधिक होती है।


अंडा चुराते ही प्रजनन की स्थिति में आ जाते हैं गिद्ध
गिद्ध के अंडे इसलिए चुराया जाता है जिससे गिद्ध को लगता है कि उसका बच्चा नहीं रहा। इसलिए वह दोबारा प्रजनन की स्थिति में आ जाते हैं और इनकी संख्या वृद्धि में मदद मिलती है। चूजा निकलने के बाद कुछ दिनों के लिए चूजों को बकरी का नरम मीट दिया जाता है, बाद में होल्डिंग वे में पंख विकसित होने तक लगभग तीन माह तक रखा जाता है।



प्रदेश के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और कैबिनेट मंत्री राव नरबीर सिंह 25 गिद्धों को प्रजनन केंद्र से 17 दिसंबर को छोड़ेंगे। इसकी तैयारी चल रही है। अभी केंद्र में 380 के करीब गिद्धों की संख्या है। इससे पहले जनवरी 2024 में 20 व्यस्क गिद्धों को महाराष्ट्र फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को सौंपा गया था। - सुरजीत सिंह, सब इंस्पेक्टर वाइल्ड लाइफ पंचकूला
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें