डीसी के पूर्व पीए की गिरफ्तारी पर रोक
- तीनों आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका मंजूर
- सेक्टर-33 स्थित कोठी की फाइल खोने संबंधी मामला
- पुलिस की स्टेट्स रिपोर्ट के अनुसार तीनों ने ज्वाइन की पुलिस जांच
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। सेक्टर-33बी स्थित एक प्रॉपर्टी की फाइल गायब होने के मामले में डीसी के पीए रहे राकेश मोहन, तत्कालीन सुपरिंटेंडेंट (हाउसिंग ब्रांच) नीलम गुप्ता और सीनियर असिस्टेंट हरि मोहन को शुक्रवार को जिला अदालत से राहत मिल गई। अदालत ने तीनों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। अदालत ने यह आदेश पुलिस द्वारा स्टेट्स रिपोर्ट दाखिल करने के बाद जारी किए।
अदालत ने तीनों की गिरफ्तारी पर पहले 23 और बाद में 27 जुलाई तक रोक लगाई थी। साथ ही तीनों को पुलिस जांच ज्वाइन करने को कहा था। अदालत ने पुलिस को भी स्टेट्स रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था। शुक्रवार को दाखिल पुलिस की स्टेट्स रिपोर्ट के अनुसार तीनों आरोपियों ने पुलिस जांच ज्वाइन कर ली है और वह जांच में सहयोग कर रहे हैं। इसके बाद अदालत ने उनकी याचिका मंजूर करते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी।
इससे पहले तीनों आरोपियों की ओर से दायर याचिका में अपील की गई है कि वह पिछले कई वर्षों से सरकारी नौकरी पर हैं। इस दौरान उनका रिकार्ड हमेशा अच्छा रहा है और कभी उनके खिलाफ लापरवाही की कोई शिकायत भी नहीं आई है। वहीं, फाइल खोने का जो आरोप है, वह आधारहीन है। वहीं राकेश मोहन की ओर से दलील दी गई है कि सरकारी रिकार्ड में दर्ज है कि वह फाइल ब्रांच से संबंधित अथॉरिटी को भेजी गई थी। ऐसे में जब फाइल उसके पास ही नहीं है तो उस पर फाइल खोने का आरोप गलत है।
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यह है मामला
एडवाइजर के आदेश पर डीसी के पीए राकेश मोहन सहित इस्टेट आफिस के दो अन्य कर्मचारियों पर फाइल गायब होने के मामले में सेक्टर-17 थाना पुलिस ने 6 जुलाई को केस दर्ज किया था। पुलिस ने राकेश मोहन के अलावा तत्कालीन सुपरिंटेंडेंट (हाउसिंग ब्रांच) नीलम गुप्ता और सीनियर असिस्टेंट हरि मोहन के खिलाफ आईपीसी की धारा-409 (सरकारी कर्मी द्वारा अमानत में खयानत) के तहत मामला दर्ज किया था। यह केस सेक्टर-33बी स्थित एक प्रापर्टी की फाइल गायब होने के मामले में करीब 16 साल बाद आरोपियों पर मामला दर्ज किया गया है। उक्त कोठी मंजीत कौर के नाम अलॉट की गई थी। मंजीत ने इस कोठी की एवज में 10 फीसदी किस्त भी जमा करा दी थी। बाद की किस्तें जमा न होने के कारण इस्टेट आफिस की ओर से इस कोठी की अलॉटमेंट को रद्द करने के आदेश जारी कर दिए गए थे। वर्ष 2008 में दोबारा से प्लॉट की अलॉटमेंट के लिए नीलामी प्रक्रिया शुरू की गई। यह मामला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट तक गया। हाईकोर्ट ने यूटी प्रशासन को दोबारा कोठी के अलॉटमेंट को लेकर नीलामी प्रक्रिया पर स्टे लगा दी थी और यूटी प्रशासन को जवाब दाखिल करने के लिए कहा। मामले से जुड़ी फाइल जब हाईकोर्ट में पेश करने की बारी आई तो इस्टेट आफिस से यह फाइल गायब की जा चुकी थी। इस्टेट आफिस के रिकॉर्ड में यह फाइल आखिरी बार तत्कालीन डीसी के पीए रहे राकेश मोहन के पास थी। फाइल गुम होने की सूचना के बाद विभागीय जांच शुरू हुई। फाइल गुम होने की वजह से प्रशासन को हाईकोर्ट से कड़ी फटकार लगी थी। मामले की विजिलेंस जांच हुई तो उसके बाद चीफ विजिलेंस अधिकारी (एडवाइजर) के आदेश पर सेक्शन आफिसर ने तीनों कर्मियों के खिलाफ पुलिस को शिकायत दी। इसके बाद पुलिस ने संबंधित धारा में केस दर्ज कर लिया।