-आज भी कायम है नवरात्र में सांझी पूजा की प्राचीन परंपरा
-दीवारों पर महिलाओं ने बना दी सांझी, आज से शुरू हो जाएगी पूजा
संवाद न्यूज एजेंसी
पलवल। झांझी-झांझी जै लै, झांझी मांगे घी बातौ कहां से लाऊं मैं घयौ बातौ जैसे परंपरागत लोक भजन बृहस्पतिवार से जिले में घरों के अंदर सुनाई देने लग जाएंगे क्योंकि नवरात्र शुरू होते ही घरों में सांझी पूजन भी शुरू हो जाएगा। जिले में नवरात्र में सांझी पूजा की प्राचीन परंपरा आज भी कायम है। महिलाएं आज भी सांझी पूजा को उसी श्रद्धा व विश्वास के साथ करती हैं। ग्रामीण महिलाएं दुर्गा पूजा के प्राचीन तौर-तरीकों, भक्ति-गीतों जैसी परंपरा को अपने में संजोये हुए हैं। इसके लिए महिलाओं ने बुधवार को ही दीवारों पर सांझी बना ली है।
पहले दिन बनती है सांझी
नवरात्र से ठीक एक दिन पूर्व अमावस के दिन ग्रामीण पूड़ी के आकार की आटे की रोटियां बनाते हैं, जिन्हें चंदिया के नाम जाना जाता है। चंदिया बनाकर परिवार के अन्य सदस्यों के खाना खाने से पहले गाय को खिलाया जाता है। इसी दौरान घर की किसी दीवार पर सांझी बनाई जाती है, जिसे झांझी भी कहा जाता है। देवी मां की प्रतिमा (झांझी) का निर्माण भी चूल्हे वाली पीली मिट्टी से दीवार पर किया जाता है। नवरात्रों की पूर्व संध्या पर उसमें सेलखड़ी अन्य देशी रंग भरे जाते हैं। साथ ही उसके श्रृंगार के लिए आटे की लोई बनाकर उससे चमकीले कागजों को चिपकाकर झांझी माता के कपड़े व अन्य आभूषणों को दर्शाया जाता है।
व्रत के नियम भी अलग
ग्रामीण महिलाएं झांझी के सामने दीप जलाती हैं और व्रत की शुरुआत करती हैं। साथ ही तुलसी के वृक्ष में पानी लगाकर उसकी भी पूजा करती हैं। महिलाएं नौ दिन के व्रत के दौरान नंगे पांव रहती हैं और चारपाई या बेड पर नहीं सोती हैं। सुबह व्रत की शुरूआत में महिलाएं झांझी के सामने दीप जलाकर पूजा के बाद स्थानीय मंदिर जाती हैं। शाम होने पर महिलाएं झांझी के सामने एकत्र होकर देवी मां के झांझी-झांझी जै लै, झांझी मांगे घी बातौ कहां से लाऊं मैं घयौ बातौ लोकगीत गाकर माता को भोग लगाती हैं।
केसूला मांगने की भी परंपरा
नवरात्रों के दौरान एक विशेष बात और प्रचलित है, जिसके अनुसार छोटे-छोटे नन्हें-मुन्ने मिट्टी के दीपक लेकर घरों में जाते हैं और केसूला मांगते हैं। गांव में उन्हें अनाज दान में और शहरों में कुछ पैसे देना बहुत शुभ कार्य माना जाता है।