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यहां 70 की उम्र में महिलाएं बन रहीं मां, पर क्यों?

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जब मेरी उम्र पांच साल की थी तो मेरे आगे-पीछे दौडती मेरी मां की उम्र क्या थी? यही सवाल मेरे मन में कौंधा जब मैं मिली पांच साल की नवीन से।
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पांच साल की नवीन की मां 75 साल की हैं। वो अपनी बच्ची के आगे-पीछे नहीं दौडतीं। वो तो चलती भी हैं, तो पैर खूब जमा-जमा कर रखती हैं। ठीक मेरी नानी की तरह, जिन्हें अपनी अधेड उम्र में गिरकर हड्डी टूटने का डर ज्यादा रहता है।

पर नानी-दादी जैसी अपनी उम्र की फिक्र छोड राजो देवी पांच साल पहले मां बनीं। ऐसा नहीं कि इससे पहले उन्होंने कोशिश नहीं की। शादी के 55 साल बच्चा पैदा करने की नाकाम कोशिशों में ही बीते।
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फिर आईवीएफ (इन-विट्रो-फर्टिलाइजेशन) तकनीक के बारे में पता चला। अलेवा के अपने गांव से हिसार के एक क्लीनिक का दो घंटे का रास्ता तय किया और अपनी जिन्दगी के आखिरी पडाव में अपने सबसे मुश्किल सफर की शुरूआत कर डाली।

मां न बन पाने का कलंक

लेकिन नौ महीने अपने गर्भ में बच्ची को पालकर, फिर सिजेरियन के जरिए बच्ची पैदा कर और उसके एक साल बाद ओवरी में बने सिस्ट का ऑपरेशन करवाने पर, बूढी हड्डियों में बची जान भी जाती रही है।

अब सिकुडती जा रही हैं, वजन कम हो गया है और कमर झुक गई है। पर राजो के मुताबिक, "सिर ऊंचा है, क्योंकि मां ना बन पाने का ‘कलंक’ धुल गया है"।

अपने पति बाला राम से नजर चुराकर दबी आवाज में मुझे कहती हैं, “बेऔलाद थे तो गांव में हंसी होती थी, ताने सुनने पडते थे, मां बन गई तो इज्जत बढ गई, जान का क्या है, भगवान की देन है, इस वजह से थोडे ही रुक जाते, नई तकनीक का पता चला तो कोशिश तो करनी ही थी।”

बच्चे के लिए दूसरी शादी

भारत में इस वक्त एक औरत औसतन 68.7 साल की उम्र तक जीती है। राजो ने तो 70 साल की उम्र में बच्ची पैदा की।

मैंने फिर पूछा कि अब बिगडती सेहत को देखती हैं तो बच्ची पैदा करने के फैसले पर कोई मलाल नहीं होता? पहले तो हंसी और बोलीं, "आज भी इतना दम है कि तुझ जैसी जवान लडकी को पटक सकती हूं"।

पर हल्की सी हंसी के बाद झुर्रियों से भरे उनके चेहरे पर शिकन गहराया, और बताने लगीं कि बच्चे की चाह में बाला राम ने उनकी छोटी बहन से शादी तक कर डाली, पर दूसरी शादी से भी बच्चा नहीं हुआ।

बिना लाग लपेट के राजो बोलीं, “परिवार की दो बहनें बांझ निकल गईं, इसलिए जरूरी था कि बच्चा हो, जरूरी था इसीलिए इस उम्र में भी किया।”

घर बस गया हमारा, और क्या चाहिए

पर अब आगे क्या? नवीन जब बालिग होगी, तब राजो की उम्र 88 साल हो चुकी होगी। बच्ची पैदा होने के बाद से राजो बीमार रहीं हैं, डॉक्टरों के चक्कर आम हो गए हैं।

बाला राम कहते हैं कि राजो से आठ साल छोटी उनकी दूसरी पत्नी नवीन का ख्याल रखेगी, “फिर हमारा कुनबा बडा है, पांच भाई हैं, सब देख लेंगे, घर बस गया हमारा, और क्या चाहिए।”

वैसे नवीन के पैदा होने के बाद चाहत और भी थी। बेटे की चाहत। पर राजो का शरीर एक और बच्चा पैदा करने लायक नहीं बचा। और उनकी बहन को हाई ब्ल्ड प्रेशर होने की वजह से, उनका आईवीएफ इलाज हो नहीं सकता था।

अब नवीन भी खुद को लडका बताती है। मैंने पूछा क्यों? तो बोली, “लडका कमा कर खाएगा ना, मैं तो बडी होकर थानेदार बनूंगी।”

सैकडों को उम्मीद

राजो देवी ने जो 70 साल की उम्र में किया, भटेरी देवी ने वही 66 साल में किया। हिसार के उसी क्लीनिक में उनके ट्रिप्लेट्स यानि तीन बच्चे पैदा हुए – एक बेटा और दो बेटियां।

एक बेटी की कुछ ही हफ्तों में मौत हो गई। बाकी दोनों बच्चे अब स्कूल जाने लगे हैं और भटेरी देवी 70 साल की हो गई हैं।

हिसार में नेशनल फर्टिलिटी सेंटर चला रहे डॉक्टर अनुराग बिश्नोई बताते हैं कि अधेड उम्र के सैकडों दंपति बडी उम्मीद के साथ उनके पास आते हैं। सभी की उम्मीदें पूरी नहीं हो सकतीं, पर वह कोशिश करते हैं।

अपनी टेबल पर रखीं एक दर्जन फाइलों की तरफ इशारा कर कहते हैं, “एक समय था जब यहां 150 फाइलें होती थीं, लोगों की लाइन लगी रहती थी, फिर हमें इसे रोकना पडा, जितने ज्यादा केस लेंगे उतना ही सफलता की दर कम होती जाएगी।”

अपने पिता द्वारा साल 2001 में शुरू हुए इस आईवीएफ क्लीनिक में डॉक्टर बिश्नोई ने 2005 से काम करना शुरू किया। उनके मुताबिक अब वहां सालाना 1,000 महिलाओं का इलाज होता है जिनमें से करीब 30 प्रतिशत महिलाएं 50 से 70 वर्ष की उम्र की होती हैं।

मौत तक का खतरा

इनमें से ज्यादातर की माहवारी बंद हो चुकी होती है, यानी शरीर में अंडे बनने बंद हो चुके होते हैं। ऐसे में किसी और महिला के दान किए गए अंडों को इनके पति के शुक्राणु से कृत्रिम तरीके से मिलाया जाता है और फिर भ्रूण को मां के गर्भ में डाला जाता है।

एम्स अस्पताल में स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉक्टर नीरजा भाटला के मुताबिक 50 वर्ष की आयु तक आईवीएफ का इलाज आम हो गया है पर उसके बाद एहतियात की जरूरत होती है, “अगर औरत 60 वर्ष की है तो उसकी सेहत का आकलन करना होगा, यानी गर्भ धारण करने से उनके दिल पर दबाव तो नहीं पडेगा? उनकी हड्डियां इतना बोझ सह सकती हैं? आदि।”

डॉक्टर बिश्नोई कहते हैं कि वह बहुत ध्यान से आईवीएफ के लिए महिलाओं का चयन करते हैं, उनका दावा है कि उनके क्लीनिक में किसी अधेड महिला की प्रसव के दौरान मौत नहीं हुई है।

उन्होंने कहा, “किताबें कहती हैं कि प्रसव के दौरान खून का ज्यादा रिसाव, हाइपरटेंशन, सेरिब्रल स्ट्रोक से लेकर मौत तक का खतरा है, लेकिन हमारा अनुभव कहता है कि बडी उम्र की महिलाओं को 40-45 साल की उम्र की महिलाओं से ज्यादा परेशानी नहीं होती।”
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लाखों का कर्ज

भारत में आईवीएफ का इलाज करवाने वाली महिलाओं की उम्र पर कोई सीमा नहीं है। इलाज की सफलता की दर 30 फीसदी है और खर्च लाखों का।

राजो देवी का आईवीएफ इलाज करवाने में बाला राम ने बैंक और साहूकार से करीब 2,70,000 रुपए का कर्जा लिया था, जो वो पिछले पांच साल में भी चुका नहीं पाए हैं।

पर कहते हैं कि सुकून का कोई मोल नहीं, “लडकी हो गई, घर बस गया, जायदाद की मालिक हो गई, वर्ना पडोसी ले जाते, तो क्या फायदा होता।”

भटेरी देवी के पति देवा सिंह भी मानते हैं कि आईवीएफ के बाद खर्च खूब आया और पत्नी की सेहत गिर गई, पर कहते हैं, “पहले हम जब घर से निकलते थे, तो गांववाले सुबह मुंह नहीं देखते थे, कहते थे ‘बेऔलादा’ जा रहा है और मुंह मोड लेते थे।”

भटेरी पूरे गांव में दादी के नाम से मशहूर हैं। देवा कहते हैं जब वो इलाज करवा रहे थे तो पूरा गांव उनपर हंस रहा था कि ‘इस उम्र में मां बनने चली हैं’।

भटेरी के चेहरे पर भी वैसी ही थकान है जो राजो देवी की झुर्रियों में झलकती है, पर दोनों के चेहरों पर एक गुरूर है। जिद मानो या मजबूरी। मां बनने की शान बनाए रखने में मां बनने की थकान को वो जगह नहीं देतीं।
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