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Mahendragarh-Narnaul News: जहां रिश्ते टूटते थे, वहां रेखा जोड़ रही डोर

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फोटो 02 रेखा दायमा - फोटो : सांकेतिक
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नारनौल।
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शहर के समीप गांव बाछौद की बहू रेखा दायमा ने इस कहावत को सच कर दिखाया है। काला कोट पहनकर जब रेखा अदालत में जज के सामने दलीलें रखती हैं, तो सामने वाला वकील भी उनकी तैयारी और आत्मविश्वास के आगे खामोश हो जाता है। महज चार साल की वकालत में रेखा अब तक 27 परिवारों को टूटने से बचा चुकी हैं।
मामा की इच्छा से चुना वकालत का रास्ता
मूल रूप से झज्जर जिले की रहने वाली रेखा का जन्म 23 मई 1994 को एक साधारण परिवार में हुआ। तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी रेखा ने बीएससी करने के बाद एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। रेखा बताती हैं कि उनके मामा बीए-एलएलबी हैं और उनकी इच्छा थी कि परिवार में कम से कम एक वकील जरूर हो। मामा की इसी प्रेरणा से रेखा ने वकालत को अपना करियर चुना।
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ससुराल को मनाना नहीं था आसान
रेखा की शादी वर्ष 2018 में 24 वर्ष की उम्र में गांव बाछौद में हुई। शादी के बाद जब उन्होंने वकालत करने की इच्छा जाहिर की तो ससुराल पक्ष ने साफ इन्कार कर दिया। कई दिनों तक कोशिशें नाकाम रहीं लेकिन रेखा ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने पति से कहा कि घर बैठकर वह मानसिक रूप से परेशान हो जाएंगी। पति ने उनकी बात समझी और परिवार को भी राजी किया।
पति बने सबसे बड़ा सहारा
वर्ष 2022 में रेखा के सपनों को पंख मिले। पति ने नारनौल कोर्ट में उनका रजिस्ट्रेशन करवाया और फीस भी स्वयं भरी। इसके बाद रेखा ने सीनियर एडवोकेट गिरीबाला के साथ प्रैक्टिस शुरू की और धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बना ली।
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चार साल में 27 परिवारों को जोड़ा
रेखा दायमा ने बताया कि चार वर्षों में उन्होंने ऐसे 27 परिवारों को टूटने से बचाया जो तलाक की कगार पर थे। कई मामलों में उन्हें पति-पत्नी की काउंसलिंग भी करनी पड़ी। रेखा का मानना है कि वैवाहिक विवादों में बच्चों का भविष्य सबसे बड़ा आधार बनता है। जब माता-पिता को बच्चों के भविष्य का एहसास कराया जाता है तो वे अपने गिले-शिकवे भुलाकर एकजुट हो जाते हैं।
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