नारनौल। कुष्ठ रोग त्वचा पर दिखने वाला मामूली दाग या धब्बा नहीं है। अगर इसका समय रहते उपचार न किया गया तो एक समय पर यह हड्डियों को भी गलाना शुरू कर देता है।
आमतौर पर देखने में आता है कि लोग इसे हल्के में लेते हैं, जो उनकी सबसे बड़ी गलती साबित हो सकती है। हालांकि जिले में ऐसे मरीजों की संख्या मात्र 6 ही है, लेकिन संक्रमण का खतरा बना रहता है। यह बीमारी भी सांस के माध्यम से एक इंसान से दूसरे में फैलती है।
ड्रॉपलेट इंफेक्शन यानी कुष्ठ रोग, यह बीमारी माइक्रो लेप्री नामक जीवाणु की वजह से होती है और खांसी व सांस द्वारा फैलती है। यह जीवाणु सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है। इसके बाद यह सीधा तंत्रिका तंत्र पर असर करता है। सीधे शब्दों में अगर शरीर पर कहीं भी दाग है और उस हिस्से पर सूनापन महसूस हो रहा है तो वह कुष्ठ रोग है।
दूसरे प्रांतों से आजीविका के लिए आने वाले मजदूरों की वजह से संक्रमण का खतरा सबसे अधिक होता है। जिले में भी जो 6 कुष्ठ रोग के मरीज हैं, वह सभी प्रवासी मजदूर हैं। साथ ही जिस शहर में प्रवासी मजदूरों की संख्या अधिक होगी, वहां पर कुष्ठ रोग के मरीज भी ज्यादा मिलेंगे और संक्रमण का खतरा भी उतना ही बढ़ जाएगा।
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प्रदेश में कुष्ठ के मरीजों की कुल संख्या साल 2023-24 में 351, 2022-23 में 421 व साल 2021-22 में 335 रही, जबकि जिले में इनकी संख्या 2023-24 में 6, 2022-23 में 8, 2021-22 में 4, 2020-21 में 3 व 2019-20 में 5 रही थी।
वर्जन:
अपील है कि शरीर पर कहीं भी कोई दाग व निशान है तो एक बार अवश्य जांच कराएं। इस बीमारी का 6 माह तक इलाज चलता है। 2 माह बाद संक्रमण का खतरा न के बराबर हो जाता है। अस्पताल में इस रोग से संबंधित दवाइयां मरीज को बिल्कुल मुफ्त दी जाती हैं।-डॉ. नवीन यादव, उप सिविल सर्जन, टीबी अस्पताल नारनौल।