मंडी अटेली। भागवत कथा के तीसरे दिन कथावाचक कपिल शास्त्री ने जय-विजय और भगवान दत्तात्रेय की कथा सुनाई। शास्त्री ने बताया कि जय और विजय भगवान विष्णु के द्वारपाल हैं। उनकी मूर्खता के कारण उन्हें श्राप मिला था।
पुराणों के अनुसार, जय-विजय श्रीधर नाम के ब्राह्मण के पुत्र थे। वे धर्म के नाम पर लोगों से धन एकत्रित करते थे। एक बार सनकादिक मुनि स्नान कर रहे थे, तब जय-विजय ने उनके वस्त्र चुरा लिए। इस पर सनकादिक मुनियों ने उन्हें भगवान विष्णु का द्वादशाक्षर मंत्र दिया। मंत्र के प्रभाव से जय-विजय ने कठोर तपस्या की। वहां वे भगवान विष्णु के द्वारपाल बने। एक बार सनकादिक मुनि भगवान विष्णु के दर्शन के लिए पहुंचे। जय-विजय ने उन्हें प्रवेश से रोक दिया। इससे क्रोधित होकर सनकादिक मुनियों ने उन्हें तीन जन्मों तक भगवान विष्णु के हाथों मरने का श्राप दे दिया।
भगवान दत्तात्रेय का जन्म माता अनसूया के पतिव्रता धर्म की महिमा का अद्भुत उदाहरण है। यह कथा त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश की परीक्षा, माता अनुसूया के सतीत्व की विजय और भगवान दत्तात्रेय के अवतरण की है। भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव के संयुक्त अवतार के रूप में पूजा जाता है।
इस मौके पर कार्यक्रम के आयोजन सुरेंद्र कुमार, अश्विनी कुमार, दशरथ यादव, वेद प्रकाश, बालकिशन, प्रदीप, राजेंद्र हेड मास्टर, शारदा देवी, किरण, मोनिका, चंद्रकला, कृष्णा, बबली, इंद्रावती आदि लोग मौजूद थे।