नारनौल। एक समय था जब पूरे फाल्गुन मास होली का पर्व चलता था, लेकिन अब आधुनिकता की चकाचौंध में यह पर्व कुछ घंटों में ही सिमट कर रह गया।
होली को लेकर चलने वाले सांग, गीत, धमाल तो अब लुप्त होने की कगार पर हैं। इसके अलावा होली के मेले व हंसी ठठोलियां भी अब बंद हो गई। पुराने लोग आज जब उस समय की होली को याद करते हैं तो उन्हें त्योहारों की लुप्त हो जा रही संस्कृति पर अफसोस होता है। शहर के बुजुर्ग लोगों का कहना है कि वर्ष 1970 तक तो इस क्षेत्र में होली का अंदाज ही अलग होता था।
बुजुर्गों का कहना है कि फाल्गुन को मस्त महीना कहा जाता है और होली के समय पूरे एक महीने ऐसी ही मस्ती पूरे क्षेत्र बरसती थी कि सब उसमें सराबोर हो जाते थे। बुजुर्ग लोगों का कहना है कि उस समय लोग सहनशील भी हुआ करते थे। हर मजाक को उनमें सहन करने की क्षमता होती थी, लेकिन आज थोड़े मजाक में भी झगड़े हो जाते हैं।
शहर के बुजुर्गों का कहना है कि उनके समय में होली से एक महीने पहले ही लोग घर से निकलते हुए डरते थे कि कहीं कोई रंग न लगा दे। हर मोहल्लों में टोलियां बनाकर एक-दूसरे को रंग लगाया जाता था। उन्होंने बताया कि उस समय महिलाओं में भी होली खेलने का चाव रहता था। महिलाएं छतों पर चढ़कर रंग व पानी डाल करती थीं। होली पर रात के समय खूब सांग निकाले जाते थे। धमाल मचाया जाता था। बुजुर्गों का कहना है कि पूरे एक महीने तक होली का हुड़दंग होता था। जगह-जगह ठंडाई बना करती थी जिसका लोग लुत्फ उठाया करते थे।
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होली के रंग तो अब फीके पड़ गए हैं। उनके उस समय पूरे एक महीने होली का उत्साह रहा करता था। हर मोहल्ले में सांग और धमाल हुआ करता था, लेकिन अब आधुनिकता की चकाचौंध में सब सिमट कर रह गया। -सोमप्रकाश अग्रवाल।
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होली की पुरानी संस्कृति अब नए युग में लुप्त होती जा रही है। प्रयास रहता है कि संस्कृति किसी तरह से बची रहे। इसलिए नई पीढ़ी को संस्कृति से आज भी रूबरू करवाने का प्रयास किया जा रहा है।।- मास्टर संतलाल यादव, प्रधान दक्षिणी हरियाणा संस्कृति मंच।
समय के साथ होली में भी बदलाव आ गया है। बुजुर्ग लोगों में आज भी इस पर्व को लेकर उत्साह रहता है। जिस तरह पहले हांसी मजाक किया करते थे, आज भी बुजुर्गों को एकत्रित करके यह पर्व मनाते हैं।-दुलीचंद शर्मा, प्रधान वरिष्ठ नागरिक संगठन।