नारनौल। हरियाणवी बोली प्राचीन काल से ही समृद्ध रही है। पाली, प्राकृत आदि अन्य भाषाओं की भांति, इसका विकास भी सीधे संस्कृत से हुआ है। स्पष्ट है कि बोली नहीं, हिंदी की सहभाषा है हरियाणवी।
भाषा के आधार पर ही पंजाब से अलग होकर स्वतंत्र राज्य के रूप में हरियाणा अस्तित्व में आया था। हरियाणवी को तभी राजभाषा का दर्जा मिल जाना चाहिए था। यह मानना है हरियाणा के समकालीन हिंदी साहित्य के प्रथम शोधार्थी और अधिकारी विद्वान डॉ. रामनिवास मानव का, जिन्हें हिंदी-साहित्य पर प्रथम पीएचडी और प्रथम डी.लिट होने का श्रेय प्राप्त है।
जब डॉ. मानव से पूछा गया कि आज तक हरियाणवी बोली भाषा क्यों नहीं बन पाई, तो इसके लिए उन्होंने सरकारों की उपेक्षा और गलत भाषा-नीति को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि हरियाणवी का विकास किसी भी सरकार के एजेंडे में नहीं रहा। यही कारण है कि यहां पंजाबी, उर्दू और संस्कृत अकादमियां तो स्थापित हुई, लेकिन हरियाणवी साहित्य अकादमी गठित करने का कभी किसी के दिमाग में विचार तक नहीं आया। यही नहीं हरियाणवी को गांव की बोली समझकर संभ्रांत और शिक्षित वर्ग द्वारा इसे हिकारत की नजर से देखा जाता रहा है।