नारनौल। कांता गांधी 8 भाई बहन हैं। पिता नई मंडी में किराना की दुकान चलाते थे। कांता बचपन से ही देख पाने में असमर्थ थीं। ऐसे में लोग कहते थे की बच्ची का क्या भविष्य होगा।
कांता ने हर मुश्किल को चुनौती देते हुए न केवल एमए, बीएड तक पढ़ाई की बल्कि अपनी ही जैसी बच्चियों का भविष्य भी संवार रही हैं। कांता की ही मेहनत का नतीजा है कि उनकी पढ़ाई कई युवतियां सरकारी पदों पर हैं। साथ ही कुछ बच्चियां प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही हैं। अविवाहित कांता का कहना है कि उन्होंने सारा जीवन ऐसे बच्चों के लिए ही समर्पित कर दिया है।
शहर के मोहल्ला खड़खड़ी में 1976 में मदन लाल शर्मा ने अंध विद्यालय की स्थापना की। इसी साल कांता के पिता ने उनका दाखिला यहीं करवा दिया। यहीं से 5वीं तक की शिक्षा हासिल की और फिर विद्यालय की ही ओर से उनका दाखिला सरकारी स्कूल व कॉलेज में करवाया गया। इस प्रकार कांता ने पूरी लगन से एमए बीएड की पढ़ाई पूरी की।
कांता ने बताया कि ललिता इंडियन बैंक में डिप्टी मैनेजर, अनसुइया यूनियन बैंक में पीओ, सरोज पीएनबी बैंक में लिपिक, सुषमा सेंट्रल बैंक में लिपिक, संयोगिता हिंदी की प्रवक्ता, सुशीला इतिहास की प्रवक्ता, सुनीता राजकीय कॉलेज में ग्रुप डी, रेखा पठानकोट रेलवे में ग्रुप डी, रीना आंगनबाड़ी में सुपरवाइजर, मधु जेबीटी अध्यापिका और करीना को पोस्टिंग मिलने वाली है। इसके अलावा 6 युवतियां प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुटी हुई हैं।
इंसेट
संगीत अध्यापिका बनना था सपना
पढ़ाई पूरी करने के बाद कांता संगीत की अध्यापिका बनना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने जी जान से तैयारी की और सफलता भी मिली लेकिन संगीत के बजाय उन्हें दूसरा विषय दिया गया। इस पर उन्होंने नौकरी करने से इंकार कर दिया। फिर एक क्लर्क की जॉब पाने में भी सफलता हासिल की और वह भी ठुकरा कर साल 1998 से यहीं पर बच्चों को ब्रेल लिपी से पढ़ा रही हैं। फिलहाल उनके स्कूल में 12 बच्चियां हैं।