फोटो संख्या:64- कनीना में बाबा मोलड़नाथ मंदिर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान आरती करते श्
कनीना। बाबा मोलड़नाथ मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन शनिवार को कथा वाचक ने राजा परीक्षित की कथा सुनाई। कथा व्यास आचार्य प्रवेश शर्मा ने कहा कि जन्म-जन्मांतर और युग-युगांतर में जब पुण्य का उदय होता है, तब ऐसा अनुष्ठान होता है। कथा सुनने के लिए श्रद्धालु उमड़ पड़े।
कहा कि श्रीमद्भागवत कथा एक अमर कथा है। इसे सुनने से पापी भी पाप मुक्त हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि वेदों का सार युगों-युगों से मानवजाति तक पहुंचाता रहा है। भागवत पुराण उसी सनातन ज्ञान की धारा है, जो वेदों से प्रवाहित होती चली आई है। भागवत महापुराण को वेदों का सार कहा गया है।
उन्होंने बताया कि युद्ध में गुरु द्रोण के मारे जाने से क्रोधित होकर उनके पुत्र अश्वत्थामा ने क्रोधित होकर पांडवों को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया। ब्रह्मास्त्र लगने से अभिमन्यु की गर्भवती पत्नी उत्तरा के गर्भ से परीक्षित का जन्म हुआ। परीक्षित जब बड़े हुए नाती-पोतों से भरा पूरा परिवार था, सुख वैभव से समृद्ध राज्य था।
जब वह 60 वर्ष के थे तो एक दिन वह क्रमिक मुनि से मिलने उनके आश्रम गए। उन्होंने आवाज लगाई, लेकिन तप में लीन होने के कारण मुनि ने कोई उत्तर नहीं दिया। राजा परीक्षित स्वयं का अपमान मानकर निकट मृत पड़े सर्प को क्रमिक मुनि के गले में डाल कर चले गए। अपने पिता के गले में मृत सर्प को देख मुनि के पुत्र ने श्राप दे दिया कि जिस किसी ने भी पिता के गले में मृत सर्प डाला है। उसकी मृत्यु सात दिनों के अंदर सांप के डसने से हो जाएगी। ऐसा ज्ञात होने पर राजा परीक्षित ने विद्वानों को अपने दरबार में बुलाया और उनसे राय मांगी। उस समय विद्वानों ने उन्हें सुखदेव का नाम सुझाया और इस प्रकार सुखदेव महाराज का आगमन हुआ। इस अवसर पर मंदिर कमेटी के प्रधान दिनेश यादव, रामकिशन शर्मा रामा, राजेंद्र भेलिया, अनिल, दीपक, दिनेश यादव, राजेंद्र सिंह, अनिल कुमार आदि मौजूद रहे।