महेंद्रगढ़। जया कॉलोनी में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन श्रद्धालुओं को श्रीकृष्ण व रुक्मणी विवाह की कथा सुनाई गई। कथा वाचक पंडित कुलदीप भारद्वाज ने कथा में भगवान का मथुरा प्रस्थान, कंस का वध, महर्षि संदीपनी के आश्रम में विद्या ग्रहण करना, कालयवन का वध, उधव गोपी संवाद सहित रुक्मणी विवाह के प्रसंग का संगीतमय भावपूर्ण पाठ किया गया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को दैनिक दिनचर्या में ब्रह्म मुहूर्त में उठना दैनिक कार्यों से निर्वत होकर यज्ञ करना, तर्पण करना, प्रतिदिन गाय को रोटी देने के बाद स्वयं भोजन करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति पर ईश्वर सदैव प्रसन्न रहता है। इस दौरान श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह की झांकी सजाई गई। उन्होंने बताया कि
श्रीमद्भागवत रूपी शरीर के पांच प्राण या हृदय माने जाते हैं। पंच प्राणों का ईश्वर के साथ रमण ही रास है। इस रासलीला के श्रोता हैं। धर्म-ज्ञान, विवेक, वैराग्य से पूर्ण व मरण की प्रतीक्षा करने वाले राजा परीक्षित और वक्ता हैं। उन्होंने बताया कि रास क्या है। यह है श्याम सुंदर श्रीकृष्ण के स्वरूपा नंद का वितरण। रास शब्द का मूल रस है। रस स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं। परंतु बिना योगमाया के रास नहीं हो सकता। क्योंकि रस को अनेक बनाकर ही रास हो सकता है। इस मौके पर अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।