साऊर्थन राइस ब्लैक स्ट्रेक्ड डवारफ (एसआरबीएसडी) वायरस धान की फसल को चपेट में ले रहा है। पंजाब के बाद प्रदेश के यमुनागर, कैथल, पानीपत व करनाल सहित कुरुक्षेत्र में भी धान की फसल में इस वायरस का प्रकोप देखने को मिल रहा है। जिला में करीब 40 हजार एकड़ धान की फसल इस वायरस की चपेट में आ चुकी है, जिससे किसानों से लेकर कृषि वैज्ञानिकों में भी हड़कंप मचा हुआ है।
कृषि वैज्ञानिकों की टीमें लगातार खेतों में पहुंच रही है तो इस बीमारी का आंकलन भी किया जा रहा है। किसान लगातार कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क कर रहे हैं तो वहीं वैज्ञानिक उन्हें न केवल जागरू कर रहे हैं बल्कि इस वायरस को आगे बढ़ने से रोकने के उपाय भी बता रहे हैं। आशंका जताई जा रही है कि इस वायरस को नहीं रोका जा सका तो धान के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। बता दें कि जिला भर में करीब दो लाख 50 हजार एकड़ धान का रकबा है, जिसमें से करीब 16 फीसदी में यह बीमारी देखने को मिली है।
कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो एसआरबीएसडी वायरस धान के पौधे की जड़ों पर असर करता है। जड़ों का विकास रूक जाता है, जिसके चलते पौधा भी छोटा रह जाता है। उसमें फुटाव नहीं बढ़ पाता। धान लगाने के करीब 35 दिन बाद ही इस बीमारी का पता चल सका है। कईं क्षेत्रों में इस बीमारी के ग्रस्त फसल में रिकवरी भी देखी गई है।
कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि यह बीमारी सबसे पहले सन 2001 में दक्षिण चीन में रिकॉर्ड की गई थी। वर्तमान में यह पंजाब व हरियाणा भर में पहुंच चुकी है। यह सफेद पीठ वाले तेले के माध्यम से फैलती है। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रदु्युमन भटनागर के मुताबिक पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कड़ी मेहनत कर इस वायरस की पिछले सप्ताह ही पचान की है।
चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के अंतर्गत स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रदु्युमन भटनागर का कहना है कि जिला में टीम ने लगातार सर्वे किया है और हर ब्लॉक में ही यह बीमारी देखी गई है। यह वायरस सफेद तेले के जरिए अधिक फैल सकता है। ऐसे में तेले को मारने के लिए किसानों को अच्छी दवा का स्प्रे समय रहते करना चाहिए।
प्राकृतिक खेती के प्रदेश ट्रेनिंग सलाहकार डॉ. हरिओम ने दावा किया है कि इस वायरस का प्रकोप प्राकृतिक खेती में न के बराबर देखने को मिल रहा है। उनका कहना है कि इस समय पंजाब और हरियाणा में धान की फसल में एक बीमारी का प्रकोप है। जहां भी प्रकृतिक तरीके से धान की फसल तैयार की जा रही है वहां पर यह बेहद कम ही देखने को मिली है।