हर साल सावन माह आता है एक समय था जब इस माह का बेसब्री से महिलाओं को इंतजार रहता था। लेकिन समय के अनुसार सब कुछ बदल गया। पहले जैसी बात नहीं रही। जब में अविवाहित थी, उस समय हम सभी सखी सहेलियां इकट्ठी होकर पेड़ पर झूला कहां और कैसे डालना है, को लेकर योजना बनाती थी। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में हमारे पारंपरिक त्योहार लुप्त होते जा रहे हैं। सावन माह में झूले तीज उत्सव मेहंदी प्रतियोगिताएं कोथली देने की परंपरा, ये सब या तो बंद हो गई हैं या फिर नाममात्र रह गई हैं।
यहां तक कोथली के लिए दुकानों पर भीड़ लगी रहती थी। घरों के आंगन में झूलों की कतारें होती थीं। हाथों में मेहंदी लगाना पारंपरिक कपड़े पहनकर सावन के गीत गाती थी। परंतु आज के समय में यह सब मानो कहीं खो सा गया है लेकिन आज तो लोगों के पास समय है। आज के समय में न तो वो मेल मिलाप है, न ही वह उत्साह। अब कुछ लोग है जो इन परंपराओं को निभाते हैं। त्योहारों का असली आनंद तब था। जब पूरा समाज मिलकर उन्हें मनाता था। अब न समय है, न साथ है और न ही सामूहिक भावना।
प्रस्तुति : 65 वर्षीय नीलम अरोड़ा सेक्टर 13 निवासी