कुरुक्षेत्र। संघ का उद्देश्य देश पर प्रभुत्व जमाना या राजनीतिक सत्ता हासिल करना नहीं है बल्कि समाज को संगठित और सशक्त बनाना है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के श्रीमद्भगवद् गीता सभागार में आयोजित '''' समाज परिवर्तन और हम '''' विषयक गोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने संघ के मूल सिद्धांतों और कार्यदृष्टि को विस्तार से समझाया।
उन्होंने संघ के कार्य को किसी परिस्थिति की प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक दीर्घकालिक और सकारात्मक सामाजिक प्रयास बताया और कहा कि संघ किसी व्यक्ति, संस्था या विचारधारा के विरोध में काम नहीं करता बल्कि उसका लक्ष्य समाज के सभी वर्गों को जोड़कर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक कला, क्रीड़ा और राजनीति के क्षेत्र में कार्य करते हैं लेकिन संघ कोई राजनीतिक संगठन नहीं है। इस धारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि संघ सत्ता की राजनीति से दूरी बनाए रखता है, इसलिए जब-जब संघ से जुड़े लोग सत्ता में आए तो संघ ने सत्ता से दूरी बनाए रखी। संघ की प्राथमिकता समाज निर्माण है।
उन्होंने कहा कि संघ व्यक्तित्व निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का कार्य करता है। समाज परिवर्तन केवल नीतियों से नहीं बल्कि व्यक्तियों के संस्कार और सामाजिक समरसता से संभव होता है। संघ का प्रयास यही है कि समाज में सकारात्मक ऊर्जा पैदा हो और विभिन्न वर्गों के बीच विश्वास बढ़े। कार्यक्रम में शिक्षाविदों और अधिकारियों से संवाद करते हुए उन्होंने संघ को समझने के लिए उसकी कार्यप्रणाली और इतिहास को गहराई से जानने की आवश्यकता पर जोर दिया।
लोकप्रियता या प्रसिद्धि की नहीं कोई होड़
सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा कि संगठन के भीतर लोकप्रियता या प्रसिद्धि की कोई होड़ नहीं है। यदि संघ को चर्चा मिलती है तो वह उसे लक्ष्य नहीं बनाता बल्कि अपने मूल कार्य समाज सेवा और संगठन निर्माण पर ही केंद्रित रहता है। संघ की विचारधारा को ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ते हुए बताया कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की असफलता के बाद देश में आत्ममंथन की प्रक्रिया शुरू हुई जिससे यह विचार सामने आया कि राष्ट्र को बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक रूप से मजबूत करना आवश्यक है। संघ की स्थापना इसी सोच की निरंतरता है।
संघ पैरामिलिट्री या राजनीतिक दल नहीं : भागवत
सरसंघचालक मोहन भागवत ने संघ की पहचान के लिए प्रचलित भ्रांतियों पर भी स्पष्टता दी। उन्होंने कहा कि संघ के ‘पथ संचलन’ को देखकर कई लोग इसे पैरामिलिट्री संगठन मान लेते हैं, जबकि संघ का चरित्र पूरी तरह सामाजिक और सांस्कृतिक है। संघ के स्वयंसेवक समाज के सहयोग और अपने संसाधनों से देशभर में हजारों सेवा कार्य चला रहे हैं।