नारायणगढ़ नगर पालिका के चुनाव परिणाम घोषित आने के बाद जहां भाजपाई खासे उत्साहित दिख रही है, तो वहीं कांग्रेस के आला नेता परिणामों को लेकर थोड़े असमंजस की स्थिति में हैं। क्योंकि इस ओवरआल चुनाव में यदि देखें तो भाजपा ने अपना वोट प्रतिशत अपेक्षाकृत बढ़ाया है और कांग्रेस का वोट प्रतिशत कम हुआ है। इसी को लेकर भाजपा जहां जश्न मोड में है, तो कांग्रेस मंथन मोड में।
दरअसल, ये चुनाव यहां नारायणगढ़ में भाजपा के लिए बड़ी प्रतिष्ठा का सवाल था। क्योंकि हरियाणा सरकार के राज्यमंत्री नायब सैनी इसी हल्के के विधायक है। इसलिए ये चुनाव सीधे सरकार के लिए प्रतिष्ठा का सवाल थे। इसके लिए भाजपा ने जी-तोड़ मेहनत की। राज्यमंत्री नायब सैनी ने इसकी कमान संभाली और पूरी जिला भाजपा के पदाधिकारियों ने यहां जीत के लिए ताकत झौंकी।
भाजपा के प्रदेश कार्यकारिणी के नेतागण व पदाधिकारी भी यहां नारायणगढ़ में पहुंचे और इन सभी नेताओं ने मतदाताओं के सामने केंद्र व राज्य में भाजपा सरकार की उपलब्धियां गिनवाकर जीत के लिए अपनी झोलियां फैलाई। इन आला नेताओं ने मतदाताओं को समझाने का प्रयास किया कि केंद्र से लेकर राज्य तक भाजपा की सरकार है, इसलिए वार्ड स्तर पर भी यदि भाजपा का पार्षद होगा तो विकास अवरूद्ध सीधे आएगा।
नेताओं का ये प्रयास थोड़ा रंग लाया और केंद्र व राज्य में सरकार का होना यहां नारायणगढ़ नगर पालिका चुनाव में भाजपा के लिए ‘संजीवनी’ बना और इसी संजीवनी के सहारे भाजपा पिछली बार की अपेक्षाकृत और उठी और 3 से 5 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही।
एकजुट होती कांग्रेस तो कुछ और होती तस्वीर
कांग्रेस की परफोरमेंस इस चुनावी परिणाम में जो भी रही, उसका नतीजा आपसी बिखराव और फूट रहा। पिछली बार 9 सीटों पर जीतने व समर्थन हासिल करने वाली कांग्रेस इस बार 6 सीटों तक सिमट गई। इस बात को लेकर कांग्रेसी नेताओं में खासा मलाल है। यहां कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सांसद कुमारी सैलजा ने चुनाव की जिम्मेवारी पूर्व मुख्य संसदीय सचिव व दो बार विधायक रह चुके रामकिशन गुज्जर के कंधों पर छोड़ी थी।
लेकिन कांग्रेस पहले ही पायदान में उस वक्त उलझ गई, जब पंद्रह वार्डों में कांग्रेस की ओर से लडने वाले दावेदारों की संख्या बहुत ज्यादा थी।
इसलिए हारकर पूर्व विधायक गुज्जर को ये ऐलान करना पड़ा कि जिस-जिस वार्ड में कांग्रेस समर्थित एक प्रत्याशी होगा, वहां कांग्रेस के आला नेता पूरा जोर लगाएंगें, लेकिन जिस वार्ड में कांग्रेसी एक-दूसरे के मुकाबले में खड़े होकर पार्षद का चुनाव लड़ेंगे, उन वार्डों से कांग्रेस के आला नेता खुद को दूर रखेेंगे, कांग्रेस खुद अपने दम पर अपनी जीत व हार तय करेंगे। अंतत: कांग्रेसी को अपने ही साथियों के मुकाबले में खड़ा होना कांग्रेस को 3 सीटों का नुकसान दे गया।
इसका फायदा भाजपा, आजाद और इनेलो को मिला। भाजपा दो सीटों से आगे बढ़ी, तो इनेलो का भी खाता खुल गया, जबकि इस बार दो आजाद पार्षदों ने भी जीत दर्ज कर ली।