केयू का युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग हरियाणा की लुप्त हो चले लोकनृत्य ‘लूर’ को फिर से पुनर्जीवित कर मंच प्रदान करेगा। इस आशय की पुस्तिका का गुरुवार को हरियाणा के राज्यपाल और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलाधिपति बंडारू दत्तात्रेय ने विमोचन किया। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय द्वारा लूर नृत्य के संरक्षण से हरियाणा राज्य की विलुप्त होती हुई एक नृत्य विधा बच जाएगी।
इस विषय में युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक डॉ. माह सिंह पूनिया ने बताया कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय सदैव हरियाणवी संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। इसी कड़ी में हरियाणा में लुप्त हो चले ‘लूर’ नृत्य को फिर से पुनर्जीवित फिर से युवा समारोह में शामिल कर जीवंत किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि फागुन महीने में ग्रामीण बालिकाओं एवं महिलाओं द्वारा लूर नृत्य करने की परंपरा रही है। वर्तमान में यह परंपरा लुप्त प्राय हो चली है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की टीम ने गांव में जाकर ‘लूर’ नृत्य के संरक्षण के लिए अनेक सार्थक कदम उठाए हैं और ‘लूर’ के गीतों एवं नृत्य का डॉक्युमेंटेशन किया है। आने वाले दिनों में लेकर ‘लूर’ नृत्य को लेकर विश्वविद्यालय में एक कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा, जिसमें लूर नृत्य तैयार किया जाएगा और रत्नावली समारोह में ‘लूर’ नृत्य का प्रारूप प्रस्तुत किया जाएगा। उसके बाद यह नृत्य कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक समारोह का हिस्सा बनेगा। इस आशय की पुस्तिका का विमोचन गुरुवार को राज्यपाल ने कर इस कार्य को हरी झंडी प्रदान की। इस मौके पर कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा, आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. बलदेव धीमान, केयू कुलसचिव डॉ. संजीव शर्मा, प्रो. ब्रजेश साहनी, डॉ. महासिंह पूनिया सहित अन्य मौजूद रहे।