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Kurukshetra News: रामलीला में 45 वर्ष तक निभाया रावण का किरदार

Sun, 28 Sep 2025 03:53 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
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कुरुक्षेत्र। धर्मचंद गांधी जानकारी देते हुए। संवाद
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सेवा सिंह
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कुरुक्षेत्र। गोशाला बाजार के रहने वाले धर्मचंद गांधी भले ही आज 88 बरस के हो गए हैं। उम्र के इस पड़ाव के चलते 10 साल से अभिनय छोड़ चुके हैं। शरीर आज पहले की तरह साथ नहीं दे रहा लेकिन रावण का जिक्र आते ही उनके अंदर का किरदार जाग उठता है। वही अंदाज और वही डायलॉग आज भी पल भर में बिना मंच के ही जीवंत कर देते हैं। साधारण से लिबास में भी जब वे रावण की अदाकारी के डॉयलॉग बोलते हैं तो लोग सन्न रह जाते हैं।

करीब 45 वर्षों तक रामलीला के श्रीराम व दशरथ को छोड़ हर किरदार निभाया। इसमें सबसे ज्यादा रावण के रूप में ही रहे और इस किरदार को इतने वर्षों तक इस तरह जीवंत किया कि परिवार भले ही उन्हें धर्मचंद गांधी कहे लेकिन दुनिया के जहन में वे आज भी रावण है।
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करीब 25 वर्षों से हाथ की मालिश का हुनर रखने वाले धर्मचंद गांधी बताते हैं कि इस किरदार ने उन्हें सब कुछ दिया। उन्होंने इस किरदार को इस तरह जीवंत किया कि उस समय जब वह रावण के रूप में घोड़े पर चढ़कर निकलता था तो बच्चे दरवाजा बंद कर लेते थे लेकिन बड़े लोग उन्हें बड़ा विद्वान मानते हुए पांव तक छूते थे। लोग उनके असल नाम को भूलने लगे थे। जहां भी जाते तो यही कहा जाता था कि रावण जी आए हैं। ऐसे में कईं बार महसूस भी हुआ कि उनकी असली पहचान ही गायब हो गई लेकिन यह भी सही था कि लोग अपनी जगह गलत नहीं थे। धीरे-धीरे समझ आया कि किसी खास किरदार का लोगों के दिल पर कैसा व कितना असर हो जाता है।


स्कूल समय में करते थे नाटक
धर्मचंद गांधी बताते हैं कि उनका मूल गांव पाकिस्तान के मुलतान में धर्मपुरा है। विभाजन की विभिषिका को झेलते हुए उनका परिवार भी यहां आकर बसा था। विपरित परिस्थितियों का सामना करते हुए 10वीं तक पढ़ाई की तो इसी दौरान 1953-54 में गीता स्कूल में पढ़ते हुए राजा हरिशचंद्र, सुल्ताना डाकू जैसे नाटक करते थे। वहीं से अभिनय करने का शौक हुआ तो श्रीराम ड्रामेटिक कल्ब से जुड़ गए और इसके बाद श्रीराम व दशरथ को छोड़ हर भूमिका अदा की।


आज भी रावण दहन के दौरान किया जाता है सम्मान
धर्मचंद गांधी बताते हैं कि आज तक एक दिन भी ऐसा नहीं गया कि श्रीरामलीला ड्रामेटिक कल्ब की ओर से की जाने वाली रामलीला में न पहुंचे। वे रामलीला शुरू होने से पहले पहुंच जाते हैं और खत्म होने पर ही लौटते हैं। इस बीच कुछ गीत व अन्य अदाकारी भी दिखा देते हैं। यहीं नहीं उन्हें रावण दहन के दौरान निकाली जाने वाली भव्य शोभा यात्रा में खास तौर पर बुलाया जाता है तो उनका पूरा मान-सम्मान भी किया जाता है। उन्होंने रावण दहन के दौरान ही रावण का सबसे लंबे समय तक अभिनय किया। उस समय रावण घोड़े पर सवार होकर पूरे शहर में घूमता था। वहीं किरदार लोगों के जहन में आज भी ज्यों का त्यों है। पिछले कईं वर्षों से उनके भतीजे फतेहचंद गांधी दशहरे के दिन रावण का किरदार उसी अंदाज में निभा रहे हैं।


न बिजली, न लाउड स्पीकर फिर भी जमे रहते थे लोग
धर्मचंद बताते हैं कि उस समय न बिजली थी न लाउड स्पीकर, फिर भी हजारों लोग रामलीला खत्म होने तक जमे रहते थे। बीच में किसी को उठना पड़ता था तो फिर जगह नहीं मिल पाती थी। अब दौर बदला तो रामलीला मंचन के तरीके भी बदल गए।


अपने अंदर का रावण मारे, यही सीख
धर्मचंद कहते हैं कि रावण का किरदार यही सीख देता है कि हमें अपने अंदर के रावण को मारना चाहिए। रावण की एक गलती ने उन्हें कहां से कहां पहुंचा दिया। यह किरदार सिर्फ मनोरंजन नहीं बड़ी सीख है। उनकी विद्वानता को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता।
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कुरुक्षेत्र। धर्मचंद गांधी जानकारी देते हुए। संवाद

कुरुक्षेत्र। धर्मचंद गांधी जानकारी देते हुए। संवाद

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