संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। दयानंद महिला महाविद्यालय में आयोजित पांच दिवसीय शैक्षिक कार्यशाला का बुधवार को समापन हुआ। मुख्यातिथि गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत छात्राओं को संबोधित करते हुए भोगवादी संस्कृति के पनपने के कारण मूल्य और संस्कार उपेक्षित होते चले गए हैं, जिससे वास्तविक मानव का विकास रुक गया है। इसी का परिणाम समाज में फैली बुराइयां और कुरीतियों के रूप में हमारे सामने है।
उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर अशांति और युद्ध के माहौल से असुरक्षा की भावना प्रबल है। उन्होंने लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति की आलोचना करते हुए कहा कि इसने भारत की स्थिति को बेहतर बनाने की अपेक्षा बदतर किया है। वर्तमान में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के माध्यम से प्रधानमंत्री ने इस स्थिति में परिवर्तन करने की चुनौती को स्वीकार किया है, उन्होंने भारत को सुखद भविष्य की ओर ले जाने का संकल्प लिया है। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में स्वामी दयानंद सरस्वती व आर्य समाज के योगदान पर भी प्रकाश डाला।
सांसद नायब सिंह सैनी ने अपने संबोधन में कहा कि वैदिक शिक्षा पद्धति ने गुरु-शिष्य की पवित्र परंपरा को जन्म दिया था, जिसे आचार्य देवव्रत अपने जीवंत प्रयासों से प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं। वैदिक शिक्षा का मूल आधार संस्कार और मानवीय मूल्य होते हैं, जिनका पालन करके कोई भी समाज सभ्य बन सकता है, इसलिए वैदिक शिक्षा दर्शन की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी।
विधायक सुभाष सुधा ने कहा कि वैदिक शिक्षा से प्राचीन कोई शिक्षा नहीं थी। वर्तमान में उसकी उपयोगिता और महत्व को भुला दिया गया है। कार्यशाला संयोजिका डॉ. सुमन राजन ने बीते चारों दिनों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. विजेश्वरी शर्मा ने कार्यशाला के आयोजन के लिए आईक्यूएसी एवं आर्य युवती परिषद की संयोजिकाओं एवं सदस्यों को बधाई दी। संचालन अंजू चावला ने किया। इस अवसर पर डॉ. राजेंद्र विद्यालंकार, राम स्वरूप नैन आदि उपस्थित रहे।