कुरुक्षेत्र। कहो तो स्टांप पेपर पर लिखकर दे दूं, यह घर बर्बाद होकर रहेगा, कोई रोक नहीं सकता। जिंदा हूं इसीलिए देख-देखकर कुड़ता रहता हूं। इससे अच्छा था, मर जाता। या फिर भगवान आंखों की रोशनी छीन लेते। न अपनी आंख से देखता, न अफसोस होता। घर में किसी को कुछ कह दो तो खाने को दौड़ते हैं। मेरी परवाह ही किसको है।
इस तरह के संवादों के साथ नाटक बाबू जी ठीक कहते थे, ने तीन पीढ़ियों के अंतर को एक साथ दिखाने का प्रयास किया। मौका था हरियाणा कला परिषद द्वारा कला कीर्ति भवन में हिंदी रंगमंच दिवस के अवसर पर आयोजित दो दिवसीय नाट्य समारोह के समापन का। समारोह में पहले दिन अभिनय रंगमंच हिसार द्वारा नाटक कोर्ट मार्शल का मंचन किया गया। वहीं दूसरे दिन मेघदूत थियेटर ग्रुप भिवानी के कलाकारों ने कौशल भारद्वाज के निर्देशन में कामतानाथ की कहानी संक्रमण पर आधारित बाबू जी ठीक कहते थे का खूबसूरत मंचन किया। नाट्य समारोह में 48 कोस तीर्थ निगरानी कमेटी के अध्यक्ष मदन मोहन छाबड़ा बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे। हरियाणा कला परिषद के निदेशक नागेंद्र शर्मा ने कलाकारों के अभिनय की सराहना की। भिवानी के कलाकारों ने नाटक बाबू जी ठीक कहते थे के माध्यम से दर्शकों को उनके घरों की कहानी याद दिलाई। जहां प्रत्येक परिवार में बुजुर्ग हर एक छोटी से छोटी चीज का ख्याल रखते हैं और अपने बच्चों को लापरवाही के लिए टोकते हैं। नाटक में भी बाबू जी ऐसे ही स्वभाव के व्यक्ति थे। जो अपने बेटे और बहू की लापरवाही से परेशान थे। घर की चीजों का ख्याल न रखना, कूलर, पंखा, लाइट, टीवी बिना किसी कारण के चलाए रखना।
बाबू जी अक्सर अपने बेटे पिंटू को रुपये की कीमत और घर की कीमत के बारे में बताते रहते लेकिन इस बात का असर पिंटू पर नहीं होता। वह यही सोचते कि उनके बाबू जी सठिया गए हैं और आए दिन किसी न किसी बात पर टोकते रहते हैं, लेकिन पिंटू जब खुद पिता बनता है और उसका बेटा ठीक उसके जैसा ही बर्ताव करना शुरू कर देता है तो पिंटू को एहसास होता है कि उसके बाबू जी ठीक कहते थे लेकिन जब तक उसे एहसास होता है बाबू जी दुनिया को अलविदा कह चुके होते हैं। इस प्रकार बुजुर्गों की अनदेखी करने वाले परिवारों पर करारा कटाक्ष कर गया नाटक बाबूजी ठीक कहते थे।
नाटक इतना दमदार रहा कि दर्शक नाटक के हर संवाद को अपने से संबंधित मान रहे थे। हास्य-व्यंग्य तथा गंभीरता से परिपूर्ण नाटक ने एक पल के लिए दर्शकों का ध्यान नाटक से हटने नहीं दिया। नाटक में पिता की भूमिका अनिल कुमार ने निभाई, वहीं बेटे पिंटू की भूमिका में श्याम वशिष्ठ रहे। मां का किरदार पूजा बजाज, नौकर सूरज, पोता मधुर वशिष्ठ रहे। अन्य सहयोगियों में यश केजरीवाल, रितिका तथा योगमाया रही। मुख्यअतिथि मदन मोहन छाबड़ा ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण है। नाटकों के माध्यम से आज की युवा पीढ़ी को सीख लेनी चाहिए।