फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Kurukshetra News: मैंने पैर खोए, पर हौसला नहीं... आज भी देश के लिए है सीना चौड़ा

विज्ञापन
विज्ञापन
कुरुक्षेत्र। तन जाता है तो जाने दो, लेकिन झुकना नहीं चाहिए। यह शब्द हैं उस वीर योद्धा के, जिन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध में अपने दोनों पैर गंवाकर भी ड्यूटी निभाई और 2010 तक सेना में सेवा करते रहे।
विज्ञापन

यह कहानी जिले के पिहोवा क्षेत्र के दिवाना गांव निवासी सेवानिवृत्त सूबेदार स्वर्ण सिंह की, जिनका जीवन देशभक्ति, त्याग और हौसले की मिसाल है। सूबेदार स्वर्ण सिंह ने बताया कि कारगिल युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी और उनकी तैनाती रोड ओपनिंग ड्यूटी पर थी। यह एक बेहद संवेदनशील जिम्मेदारी थी, जिसमें जवानों को अग्रिम क्षेत्रों में सड़कों को जांचकर सुरक्षित करना था ताकि टुकड़ियों की आवाजाही निर्बाध रूप से हो सके। उसी दौरान 19 मई 1999 की सुबह 11 बजे एक अफसर 14 जवान गश्त कर रहे थे कि जम्मू-कश्मीर में एक रूट पर तैनाती के दौरान रिमोट कंट्रोल से एक आईईडी ब्लास्ट किया गया। इस हमले में उनके कई साथी शहीद हो गए और स्वर्ण सिंह खुद गंभीर रूप से घायल हो गए। एक टांग मौके पर ही कट गई और दूसरी मांस के सहारे लटक गई।
उन्हें श्रीनगर के सैन्य अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी दोनों टांगे काटनी पड़ीं। कारगिल युद्ध के 25 साल बाद भी वह उस मंजर को भूल नहीं पाते हैं।
नौ महीने बेड पर, फिर भी देश के लिए ड्यूटी निभाई : जहां कोई और इस गहरी त्रासदी के बाद टूट जाता, वहीं योद्धा स्वर्ण सिंह ने अटूट जज्बे से ड्यूटी पर लौटने का संकल्प लिया। उन्होंने बताया कि परिवार वालों ने सेवा त्यागने की सलाह दी, लेकिन देश के प्रति उनका प्रेम हर दर्द से बड़ा था।
विज्ञापन

नौ महीने तक बेड रेस्ट के बाद उन्होंने फिर से ड्यूटी जॉइन की और कैंटीन विभाग में जिम्मेवारी दी गई। उन्होंने वहां अपनी सेवाएं दीं और 2010 में सेवानिवृत्त हुए।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें