कुरुक्षेत्र। इतिहासकारों ने ज्योतिराव फुले को यथा स्थान नहीं दिया। ज्योतिबा फुले के समतामूलक और समावेशी समाज के दृष्टिकोण ने भारत में कई सामाजिक सुधार आंदोलनों की नींव रखी। उनके कार्यों ने डॉ. बीआर आंबेडकर सहित कई समाज सुधारकों को प्रेरित किया और आधुनिक भारत की सामाजिक न्याय और समानता के प्रति प्रतिबद्धता को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ये विचार सोमवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के महात्मा ज्योतिबा फुले चेयर, इतिहास विभाग की ओर से सत्य धर्म की ओर ज्योतिराव फुले, उनके सुधार आंदोलन और विरासत का मूल्यांकन विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर मुख्यातिथि भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के अध्यक्ष व एमरेटस पद्मश्री प्रो. रघुवेंद्र तंवर ने व्यक्त किए। ये दो दिवसीय संगोष्ठी भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद के सहयोग से आयोजित की गई।
इतिहास विभाग के अध्यक्ष एवं महात्मा ज्योतिबा फुले चेयर के प्रभारी प्रो. एसके चहल ने बताया कि ज्योतिबा फुले ऐसे दौर में निकले समाज सुधारक है। जब चारों ओर सामाजिक जागरूकता के अभियान चले हुए थे तो उन्होंने समरसता का भाव रखते हुए शिक्षा के माध्यम से सामाजिक उत्थान का कार्य किया। इसके बाद डॉ. आंबेडकर व कांशी राम ने इस कार्य को आगे बढ़ाया। मुख्य वक्ता औरंगाबाद के प्रो. उमेश बागडे ने कहा कि ज्योतिबा फुले ने समाज को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जीवन और विरासत हमें करुणा, लचीलेपन और न्याय की अटूट खोज की शक्ति की याद दिलाती है।
संगोष्ठी के गेस्ट आफ आनर रवींद्र भारती विश्वविद्यालय कलकत्ता के प्रो. हितेंद्र पटेल ने कहा कि ज्योतिबा फुले का काम सामाजिक न्याय, समानता और प्रगति की ओर भारत की यात्रा का आधार है।
फुले सिर्फ सामाजिक सुधार नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन चाहते थे। उनका मानना था कि जब तक शोषित वर्ग या आम जनता शिक्षित नहीं होगी, तब तक न तो जन जागृति आएगी और न ही सामाजिक क्रांति होगी। विभिन्न सत्रों में प्रतिभागियों द्वारा ज्योतिबा फुले के जीवन दर्शन, समाज सुधार, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक उत्थान, वंचित वर्ग, शिक्षा उत्थान आदि विषयों पर शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। इस मौके पर प्रो. सुभाष चंद्र सैनी, प्रो. दारा सिंह, प्रो. कुसुम लता, डॉ. धर्मवीर सहित अन्य सदस्य एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।
ज्योतिबा फुले की शिक्षाओं का अपने जीवन में करें पालन : प्रो. सचदेवाा
कार्यक्रम अध्यक्ष कुवि कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि ज्योतिबा फुले भारत में सामाजिक क्रांति के अग्रदूत थे। वे एक महान समाज सुधारक थे, जिन्होंने जाति व्यवस्था, महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा के लिए संघर्ष किया। सत्यशोधक समाज की स्थापना की और उनकी विरासत में जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई, महिलाओं के सशक्तिकरण और हाशिए पर पड़े लोगों तक शिक्षा के प्रसार में कई योगदान शामिल हैं। ज्योतिबा फुले एक क्रांतिकारी समाज सुधारक थे, जिन्होंने अपना जीवन जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ने और हाशिए पर पड़े समुदायों के अधिकारों की वकालत करने के लिए समर्पित कर दिया। हमें उनकी शिक्षाओं का अपने जीवन में पालन करना चाहिए।
आज होगा समापन सत्र
लोक संपर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया ने बताया कि आठ अप्रैल को दोपहर साढ़े 12 बजे सीनेट हॉल में समापन सत्र में प्रो. विश्वनाथ शिंदे, पूर्व निदेशक, महात्मा जोतिबा फुले चेयर, सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी, पुणे मुख्य अतिथि होंगे और समापन भाषण देंगे। प्रो. विक्टर बाबू, इतिहास विभाग, बीबीएयू, लखनऊ सम्मानित अतिथि होंगे। उन्होंने बताया कि प्रो. अर्चना मलिक-गौरे, दर्शनशास्त्र विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय मुंबई, सम्मानित अतिथि होंगी तथा प्रो. सुभाष चंद्र सैनी, हिंदी विभाग, समापन सत्र की अध्यक्षता करेंगे।