कुरुक्षेत्र। अक्षय तृतीया पितरों की तृप्ति का पर्व है। इस दिन तिल सहित कुश के जल से पितरों को जलदान करने से उनकी अनंत काल तक तृप्ति होती है। इस तिथि से ही मां गौरी व्रत की शुरुआत भी होती है। इसे करने से अखंड सौभाग्य और समृद्धि मिलती है।
श्री दुर्गा देवी मंदिर के अध्यक्ष आचार्य डॉ. सुरेश मिश्रा ने बताया कि अक्षय तृतीया पर गंगास्नान का भी बड़ा महत्व है। इस दिन गंगा स्नान करने या अपने घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर नहाने से सभी पाप समाप्त हो जाते हैं। तीन मई को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाएगा। इस तिथि को सबसे शुभ माना जाता है। इस दिन कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है तथा शुभ काम का कभी क्षय नहीं होता। इसलिए इसे अक्षय तृतीया कहते हैं।
कहा कि इस दिन गृहस्थ लोगों को अपने धन वैभव में अक्षय बढ़ोतरी करने के लिए अपनी कमाई का कुछ हिस्सा धार्मिक कार्यों के लिए दान करना चाहिए। ऐसा करने से उनके धन और संपत्ति में कई गुना बढ़ोतरी होती है।
सतयुग और त्रेतायुग की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन ही हुई थी। वहीं भगवान परशुराम का जन्म तथा मां गंगा का धरती पर अवतरण भी अक्षय तृतीया के दिन ही हुआ था। इसी दिन महर्षि वेद व्यास ने महाभारत ग्रंथ लिखना आरंभ किया और बद्रीनाथ धाम के कपाट भी अक्षय तृतीया को खुलते हैं।
श्रद्धा पूर्वक दान से मिलेगा अक्षय पुण्य
डॉ. सुरेश मिश्रा ने बताया कि अक्षय तृतीया पर कलश, पंखा, छाता, चावल, दाल, घी, चीनी, फल, वस्त्र, सत्तू, ककड़ी, खरबूजा और दक्षिणा सहित धर्मस्थान या ब्राह्मणों को दान करने से अक्षय पुण्य फल मिलता है। अबूझ मुहूर्त होने के कारण नया घर बनाने की शुरुआत, गृह प्रवेश, देव प्रतिष्ठा जैसे शुभ कामों के लिए भी अक्षय तीज विशेष माना जाता है।