कुरुक्षेत्र। आयुष विवि में सेमिनार के दौरान विशेषज्ञ का सम्मान करते अधिकारी। पीआरओ
कुरुक्षेत्र। भारतीय ज्ञान परंपरा और आयुर्वेद के समग्र दृष्टिकोण को आधुनिक वैज्ञानिक शोध एवं प्रमाणों के साथ जोड़कर आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। विद्यार्थियों और युवा शोधार्थियों को अपने क्लीनिकल अनुभव, योग, आहार एवं जीवनशैली में सुधार के वास्तविक परिणामों पर शोध कर उन्हें वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करना चाहिए। यह विचार श्रीकृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति वैद्य करतार सिंह धीमान ने रखे। वह सोमवार को विवि में 11वें वर्ल्ड आयुर्वेद कांग्रेस के सैटेलाइट सेमिनार के दौरान संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि पंचकर्म प्रक्रियाओं की गुणवत्ता, उपचार की सटीकता और औषधियों के प्रभावी उपयोग को बेहतर बनाने के लिए शोध एवं नवाचार पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। कुलसचिव डॉ. कृष्णकांत गुप्ता ने कहा कि पंचकर्म की पारंपरिक ज्ञान परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक शोध और तकनीक से जोड़ने की आवश्यकता है। मुख्य वक्ता अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान नई दिल्ली के पंचकर्म विभाग के अध्यक्ष प्रो. आनंद रमन पीवी ने कहा कि आयुर्वेद मूल रूप से प्रमाण आधारित चिकित्सा पद्धति है। चरक संहिता सहित आयुर्वेद के ग्रंथ उपलब्ध ज्ञान, अवलोकन, तत्कालीन शोध पद्धतियों के आधार पर विकसित हुए हैं। आयुर्वेद में भी परीक्षैव बहुविधा परीक्षा की भावना के अनुरूप प्रश्न, परीक्षण, आवश्यकता पड़ने पर सुधार करने और निष्कर्ष तक पहुंचने की निरंतर गुंजाइश है।
वैद्य प्रीति भोसले ने ‘2047 का आयुर्वेद: शास्त्रीय ज्ञान से वैज्ञानिक प्रमाण, नवाचार और वैश्विक स्वास्थ्य तक’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद की समृद्ध शास्त्रीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक शोध, प्रमाण और तकनीकी नवाचार के साथ जोड़कर भविष्य की स्वास्थ्य आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता है। आयुर्वेद के पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक शोध के माध्यम से प्रमाणित करने पर इसकी उपचार पद्धतियों की प्रभावशीलता और स्वीकार्यता को और बढ़ाया जा सकता है। शोध एवं नवाचार के साथ आयुर्वेद को वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में भी निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए। इस अवसर पर डॉ. सुमित कुमार, डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. रणधीर सिंह, प्राचार्य प्रो. आशीष मेहता, प्रो. शुभा कौशल सहित अन्य शिक्षक एवं विद्यार्थी मौजूद रहे। संवाद