भाजपा ने हरियाणा की एक मात्र राज्यसभा सीट के उपचुनाव के लिए पूर्व सीएम चौधरी बंसीलाल की बहु किरण चौधरी को उम्मीदवार बनाया है। वह 21 अगस्त बुधवार को नामांकन करेंगी। पार्टी की ओर से सहमति बनने के चंद घंटे पहले उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था। वह कांग्रेस से तोशाम विधानसभा क्षेत्र से विधायक थीं।
किरण चौधरी करीब सवा दो महीने पहले लोकसभा चुनाव के बाद उन्होंने कांग्रेस के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर गंभीर आरोप लगाते हुए इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गई थीं। इससे पहले कांग्रेस ने 2004 में किरण चौधरी को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया था, मगर उस दौरान किस्मत ने साथ नहीं दिया और वह जीत नहीं सकी थी। इस बार भाग्य किरण के साथ है। भाजपा के पास बहुमत है और कांग्रेस ने फिलहाल उम्मीदवार उतारने से मना कर दिया है। ऐसे में उनकी जीत तय मानी जा रही है। उनका कार्यकाल अप्रैल 2026 तक रहेगा।
भाजपा ने 20 अगस्त मंगलवार को विधायक दल की बैठक बुलाई थी। बैठक में राज्यसभा के उपचुनाव को लेकर चर्चा होनी थी। बैठक में सीएम नायब सिंह सैनी समेत सभी मंत्री व विधायक शामिल हुए। बैठक में जजपा के विधायक जोगी राम सिहाग भी शामिल हुए। बैठक में किरण चौधरी का नाम रखा गया, जिस पर सभी विधायकों ने सहमति जताई। बैठक के बाद कृषि मंत्री कंवरपाल गुर्जर ने जानकारी दी कि किरण चौधरी के नाम पर सभी विधायकों के बीच सहमति बनी है। वह 21 अगस्त को सुबह नौ बजे अपना नामांकन दाखिल करेंगी। उन्होंने कहा कि यदि कांग्र्रेस अपना उम्मीदवार खड़ा करती है तो वह मुकाबले के लिए तैयार हैं। उनके पास पूर्ण बहुमत हैं। विधानसभा में भाजपा के 43 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। वहीं, जजपा के बागी विधायक भी पार्टी के संपर्क में हैं। बरवाला से विधायक जोगी राम सिहाग भी भाजपा की बैठक में शामिल हुए थे।
किरण खेर जब कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुई थी तो उस दौरान वह इसी शर्त पर आई थी कि उन्हें राज्यसभा भेजा जाए और उनकी बेटी श्रुति को तोशाम से विधानसभा चुनाव का टिकट दिया जाए। भाजपा ने अपना एक वादा पूरा कर दिया है और अब दूसरे वादे की बारी है। हालांकि दूसरा वादा भाजपा के लिए इतना आसान नहीं होने वाला है। कुछ अपवादों को छोड़ भाजपा में नीति रही है कि एक व्यक्ति एक पद। ऐसे में भाजपा यदि श्रुति को तोशाम से उम्मीदवार बनाती है तो पार्टी बरसों से चली आ रही नीति से किनारा कर सकती है। हालांकि पिछले दिनों संघ के साथ हुई समन्वय बैठक में आरएसएस ने नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट देने की वकालत की थी।