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सबके मन की यह अभिलाषा, युगों युगों तक हिंदी भाषा

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सबके मन की यह अभिलाषा, युगों-युगों तक हिंदी भाषा
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हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है और देश की विभिन्न भाषाओं को एक सूत्र में पिरोने के लिए सक्षम है। हम सभी चाहते हैं कि हिंदी का अधिकाधिक विकास हो, लेकिन इसके लिए सार्थक प्रयास जरूरी है। आवश्यकता है कि हम सभी हिंदी के महत्व को समझें और दूसरों को भी इसके लिए जागरूक करें। शनिवार को अमर उजाला के राष्ट्रव्यापी महाअभियान ‘हिंदी हैं हम’ के तहत आयोजित वेबिनार में बुद्धिजीवियों ने हिंदी की महत्ता पर प्रकाश डाला।
हिंदी मेें करवाते थे राष्ट्रीय संस्थान के प्रशिक्षण कार्यक्रम
राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के कृषि विज्ञान केंद्र के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक डा. दलीप गोसांई ने कहा कि हिंदी हमारी मातृभाषा है और उत्तरी भारत एवं मध्य भारत में अधिक प्रचलन में है। दक्षिण भारत के कुछ प्रदेशों में प्रचलन कम है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर पर हिंदी को हर कोई समझता है, इसलिए इसे सभी को राजभाषा से आगे बढ़कर कामकाज की भाषा बनाना होगा।
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एकता के सूत्र में पिरोती है हमारी मातृभाषा
हिंदी प्रधानाचार्या उर्वशी विग ने कहा कि हिंदी हमारी मातृभाषा है और इससे हम प्रगति की ओर बढ़ सकते हैं। दक्षिण भारत में कई बार संपर्क करने में भाषाई कठिनाई आती है। हमें क्षेत्रीय भाषाओं पर किसी प्रकार की टिप्पणी करने की बजाय अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को बढ़ावा देना चाहिये जो सभी भाषाओं को मोतियों की तरह माला में पिरोती है। सभी भाषाओं का सम्मान भी रखना है चाहे वह क्षेत्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय।
हिंदी बोलने और लिपि में नहीं आता कोई अंतर
बड़ागांव स्थित राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य अनिल कुमार शर्मा ने कहा कि हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है, जो वैज्ञानिक है। अंग्रेजी भाषा में हम लिखते कुछ हैं और बोला कुछ और जाता है। हमारी देवनागरी में हम जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखा जाता है। उसमें अंतर नहीं आता। जिस तरह अब कंप्यूटर पर हिंदी लिखी जाती है और अन्य भाषाएं भी, उसमें भी यह लिपि बेहतर मानी गई है।
हिंदी से हमारी पहचान
डा. रेखा ने कहा कि हिंदी भाषा ना केवल भारत बल्कि अन्य देशों में भी बोली जाती है। हिंदी से हमारी देश-विदेश में पहचान भी है। यह भाषा विश्व में दूसरे स्थान पर है। इससे साबित होता है कि राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी का स्थान है। आवश्यकता इस बात की है कि हम सब इसका महत्व समझें और दूसरों को भी समझाएं। साथ ही जहां हिंदी नहीं है, वहां भी इसे प्रयोग में लाएं।
भाषा के प्रति रुचि पैदा करने में शिक्षक की भूमिका अहम
हिंदी शिक्षिका बिमला शर्मा ने कहा कि उन्हें गर्व है कि उन्होंने 20 साल राजकीय विद्यालय में बच्चों को हिंदी पढ़ाई। वह चाहती हैं कि ना केवल एक देश बल्कि वैश्विक स्तर पर हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए काम किया जाए। उन्होंने कहा कि हिंदी को बढ़ावा देने में शिक्षक की भूमिका अहम है। एक शिक्षक चाहे तो वह बच्चों में भाषा के प्रति रुचि पैदा कर सकता है। नि:संदेह हमारी हिंदी मान-सम्मान की भाषा है।
मातृभाषा से बरकरार रहेगा आत्मसम्मान
प्रोफेसर डा. जसबीर सिंह ने कहा कि वर्तमान दौर में पूरे विश्व में भारत की अलग पहचान मातृभाषा हिंदी के कारण है। हम मातृभाषा से जुड़े रहेंगे तो हमारा आत्मसम्मान बरकरार रहेगा। भाषा से दूर होने पर विपरीत असर पड़ता है। इसलिए हिंदी के प्रचार-प्रसार में कमी नहीं होनी चाहिये। हम सभी को इसका महत्व समझना चाहिए और इसको बढ़ावा देने के लिए मिल जुलकर प्रयास किया जाना चाहिए।
जागरूकता अभियानों में सशक्त माध्यम हिंदी
प्रोफेसर डा. नीरू ने कहा कि आज के परिप्रेक्ष्य में वैश्विक महामारी कोरोना के समय हिंदी भाषा ही जागरूकता के लिए अधिक काम आ रही है। तभी हमारे देश में इस महामारी से मृत्यु दर कम है। अपनी सरल भाषा के माध्यम से शहर और गांवों तक जागरूकता एवं बचाव के संदेश भेजना आसान है। भाषा ही जागरूकता का माध्यम होती है। हिंदी का महत्व इस कोरोना काल में भी देखा जा सकता है।
आत्मा में रची-बसी है हिंदी
प्रोफेसर डा. ईश्वर सगवाल ने कहा कि हिंदी हमारे बोलचाल का माध्यम ही नहीं बल्कि हमारी संस्कृति की पहचान, अस्मिता और एकता के सूत्र के लिए जानी जाती है। हिंदी भाषा हमारी आत्मा में रची-बसी है। आजादी के आंदोलन को एकता में पिरोने में हिंदी भाषा ही महत्वपूर्ण थी। पूरे विश्व में हिंदी भाषा का डंका है। चीनी भाषा के बाद दूसरे स्थान पर विश्व में हिंदी है। राष्ट्रभाषा के बिना उन्नति की कल्पना नहीं की जा सकती।
हिंदी को मिले पूरा मान-सम्मान
देवराज शर्मा ने कहा कि अब वैश्वीकरण का जमाना है। केवलमात्र हिंदी से काम नहीं चल सकता। शुद्ध हिंदी का प्रयोग करने पर हर कोई उसे समझ नहीं पाता। हिंदी को पूरा सम्मान मिलना चाहिये। साथ ही दूसरी भाषाएं भी प्रतिबंधित नहीं हों। स्थिति यह भी है कि गांवों में लोग बच्चों को विदेश भेजना चाहते हैं। वह बच्चों को अंग्रेजी का अधिक ज्ञान देने पर जोर देते हैं। सभी बिंदुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
हिंदी में हों शोध पत्रों की प्रस्तुति
राजेंद्र सिंह ने कहा कि हमारे देश में शोध कार्य अंग्रेजी में होते हैं। अगर इन्हें हिंदी भाषा में किया जाए तो इससे राजभाषा का विकास होगा। साथ ही आमजन तक इसका लाभ पहुंचाया जा सकेगा, क्योंकि बहुत से लोग भाषा की समझ बिना पीछे रह जाते हैं। विश्वविद्यालयों में भी 60 प्रतिशत तक काम अंग्रेजी में होता है। हिंदी को इतना महत्व दिया जाए कि दूसरी भाषा नहीं जानने की स्थिति में कोई पिछड़ा महसूस ना करे।
हिंदी हमारे देश की आत्मा
शिक्षिका सुषमा ‘मन’ ने कहा कि हिंदी हमारे देश की आत्मा है। आत्मा से विमुख होकर कोई भी इंसान संपूर्ण विकास नहीं कर सकता। हिंदी भाषा को बढ़ावा देने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका हमारा अध्यापक वर्ग निभा सकता है। अत: अध्यापकों के प्रति अपना सकारात्मक रवैया रखें। हिंदी भाषा पर समय-समय पर प्रतियोगिताएं करवाई जाएं। उन्होंने इन पंक्तियों के माध्यम से भाव व्यक्त किए ‘मेरे मन की सदा यही अभिलाषा रहे, युगों-युगों तक हिंदी भाषा’।
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पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण हो खत्म
डा. स्वाति ने कहा कि भारत की संविधान सभा ने घोषणा की है कि देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी भारत की अधिकारिक भाषा है। इसके बावजूद यह दुखद है कि नौकरी साक्षात्कार के दौरान अंग्रेजी बोलने वाले लोगों को दूसरों पर वरीयता दी जाती है। यह पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण को दूर करने का समय है। भारत में हिंदी के लेखकों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।
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