एक साल तक चले किसान आंदोलन के दौरान जहां हरियाणा के किसानों ने पंजाबी और पश्चिमी उत्तरप्रदेश की बोली सीख ली। वहीं वहां के किसानों को हरियाणवी बोलना सिखा दिया। लंबे समय तक साथ रहने के दौरान तीनों प्रदेश के किसानों ने एक-दूसरे की संस्कृति, भाषा, खानपान, गीत-संगीत का भी आदान-प्रदान किया। इसकी बानगी करनाल में भी देखने को मिली जब एक हरियाणवी बुजुर्ग किसान ने साथ बैठे पंजाब के बुजुर्ग को टोका कि कन्ना नाल सुनना हुंदा ए, हरियाणवी ने जवाब दिया कि अक्खां नाल वेखना वी हुंदा ए...।
हरियाणवी बोली की कई खासियत हैं और पंजाबी तथा पश्चिमी उत्तरप्रदेश की बोली मीठी है। पंजाबी को सीखना ज्यादा मुश्किल नहीं। किसान आंदोलन में शब्दों की पुनरावृत्ति होती रही, जिस कारण शब्द कंठस्थ हो गए। एक साल तक किसान इकट्ठा रहे और दुख-सुख बांटा। बोलियों का आदान-प्रदान हुआ। विचारों के आदान-प्रदान से एकता बनी है। हरियाणा व पंजाब के बीच मुख्य मसला एसवाईएल नहर का है। आज तक सरकारें इसका समाधान नहीं कर सकीं। अब तक राजनेताओं ने अपने-अपने राज्यों के किसानों को भड़काकर आंदोलन कराए हैं। कंधा किसानों का और बंदूक राजनेताओं की रही है। यदि अब दोनों राज्यों के किसानों में सद्भावना कायम रही तो उनके कंधे राजनेताओं के काम नहीं आएंगे। एसवाईएल का समाधान भी जल्द निकाला जा सकता है, जो राष्ट्रहित में होगा।- डाॅ. रामजीलाल, प्रमुख शिक्षाविद् एवं पूर्व प्राचार्य, दयाल सिंह कॉलेज करनाल।