- श्री शिव चित्र गुप्त मंदिर में दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से सत्संग आयोजित
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। श्री शिव चित्र गुप्त मंदिर में दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से सप्ताहिक सत्संग आयोजित किया गया। आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी यशोदा भारती ने कहा कि परमात्मा सर्वव्यापी है, उससे अलग कुछ नहीं। सृष्टि के कण कण में वह समाया है, लेकिन मनुष्य है कि अपने आपको उससे अलग मानता है। अहंकार और अज्ञान की दीवार मनुष्य को ईश्वर से अलग करती जा रही है। मैं और तू को दूर-दूर कर देती है। इसी दूरी को पार कर मनुष्य ईश्वर तक पहुंच सकता है, उसे पा सकता है ।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर दिव्यता का वास है। बुरे से बुरा व्यक्ति भी उससे अछूता नहीं हैं। इस दिव्यता को अभिव्यक्त करने का एकमात्र साधन है ब्रह्मज्ञान। पतन की ओर बढ़ते हुए कदम भी ब्रह्मज्ञान के माध्यम से अध्यात्मिकता के उच्च शिखरों तक पहुंचने के लिए मोड़े जा सकते हैं। इस ज्ञान में वह शक्ति है, जो पतित व्यक्ति को भी गुण संपन्न बना सकती है। ब्रह्मज्ञान का अर्थ है आत्मज्ञान, यानी अपनी आत्मा को जानना।
उन्होंने कहा कि आत्मा को जानकर हम परमात्मा को भी जान सकते हैं, क्योंकि दोनों एक ही तत्व हैं। ब्रह्मज्ञान मिलने पर व्यक्ति का तीसरा नेत्र खुल जाता है, यानी अपनी आत्मा को जान लेता है एवं अंतर्मुखी होता जाता है। फिर शुरू होती है साधना, जिससे व्यक्ति की विचारधारा में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं। जो मन पहले वासनाओं, भ्रमों तथा निरर्थक बातों में उलझा रहता था, अब वह आत्मा में स्थित होने लगता है। उसके कर्मों की प्रणाली भी बदलने लगती है।
यह एक प्रयोगात्मक विज्ञान है, जो एक पूर्ण सद्गुरु द्वारा प्रदान किया जाता है। जब एक पूर्ण सतगुरु जीवन में आते हैं तो वो एक जीवात्मा के मस्तक पर हाथ रखते हैं तब उसका तीसरा नेत्र खुल जाता है। वह अपने ही घट में प्रकाश रूप में उस ईश्वर का दर्शन करता है, अनहद रूप में संगीत सुनता है, अमृत का पान करता है और श्वासों में निरंतर उस नाम का सुमिरन करता है यही वास्तव में ब्रह्मज्ञान है।