बढ़ते तापमान की वजह से दिन में लोगों को झुलसाने वाली गर्मी का सामना करना पड़ रहा है। दोपहर को सड़कों पर दोपहिया वाहनों की आवाजाही कम हो गई है। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के कृषि विज्ञान केंद्र स्थित जिला स्तरीय कृषि मौसम सेवा इकाई का पूर्वानुमान है कि सप्ताह के अंत तक अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।
मौसम विशेषज्ञ डॉ. योगेश कुमार ने बताया कि इस बार गर्मी बढ़ने का एक कारण राजस्थान पर एंटी साइक्लोनिक सर्कुलेशन से हाई प्रेशर होना है। दूसरा अक्तूबर से अप्रैल तक पश्चिमी विक्षोभ आते हैं और अपने साथ बारिश लाते हैं। इस बार फरवरी के अंत तक पश्चिमी विक्षोभ आए। उसके बाद विक्षोभों का प्रभाव पहाड़ी क्षेत्रों तक ही सीमित रहा। इन विक्षोभ से मैदानी क्षेत्र में तापमान सामान्य रहता था।
केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. डीएस बुंदेला के अनुसार मंगलवार को अधिकतम तापमान 38.6 व न्यूनतम 16.4 डिग्री सेल्सियस रहा। नमी सुबह 49 प्रतिशत व दोपहर को 13 प्रतिशत रही। वाष्प दाब 6.8 एमएम, हवा की औसत गति 2.0 किलोमीटर प्रति घंटा रही। एक दिन पूर्व सोमवार को अधिकतम तापमान 38.6 व न्यूनतम 15.8 डिग्री सेल्सियस था। पिछले वर्ष पांच अप्रैल को अधिकतम तापमान 36.2 व न्यूनतम 15.6 डिग्री सेल्सियस था।
पर्यावरणविद् डॉ. राकेश भारद्वाज ने बताया कि तालाबों की तलहटी में मछली फीड के अवशेष पड़े रह जाते हैं। ये कण गाद में मिल जाते हैं। तापमान बढ़ने पर उसमें बैक्टीरिया की उपस्थिति में हाइड्रोजन सल्फाइड गैस का उत्सर्जन होता है, जिसकी पहचान गंध से की जा सकती है। इस गैस की गंध सड़े-गले अंडे की गंध की तरह होती है। मछलियों के लिए यह गैस धीमा जहर है। तापमान बढ़ने से एकाएक गैस की सांद्रता बढ़ जाती है और मछलियां उस सांद्रता को बर्दाश्त नहीं कर पाती। जिस कारण उनकी मौत हो जाती है।
मत्स्यपालकों को चाहिए कि फीड उचित मात्रा में डालें और समय-समय पर तालाब के नीचे की गाद को निकालते रहें। साथ में मार्केट में उपलब्ध सल्फर को समाप्त करने वाले जीवाणुओं को तालाब में डालें। तालाब का पानी सर्कुलेशन में रहे। ताजा पानी शामिल होता रहे। अक्सर देखा गया है कि तालाब की गहराई ज्यादा होने पर हाइड्रोजन सल्फाइड गैस का उत्सर्जन भी ज्यादा होता है।