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विद्यार्थियों को पर्यावरण के प्रति किया जागरूक

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करनाल। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से नीलोखेड़ी स्थित राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में कृषि एवं पर्यावरण संरक्षण विषय पर चित्रकला और भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस अवसर पर केंद्र के अध्यक्ष डॉ. पंकज कुमार सारस्वत ने बताया कि अवशेष जलाने पर कालिख के कण उच्च स्तर पर पर्यावरण में उत्सर्जित होते हैं। इससे मनुष्यों में अस्थमा जैसी बीमारियां होने का खतरा रहता है। इसके अलावा पराली को खेत में जलाने से लाभकारी सूक्ष्मजीव एवं वनस्पति भी नष्ट हो जाते हैं और मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
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उन्होंने बताया कि एक टन पराली जलाने से 60 किलोग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड, 140 किलोग्राम कार्बन डाईऑक्साइडए 3.5 किलोग्राम नत्रजन के विभिन्न ऑक्साइड और 0.2 किलोग्राम सल्फर डाइऑक्साइड निकलता है। जो वायुमंडल की सबसे निचली सतह को सबसे ज्यादा गरम करता है। यदि अवशेषों को कृषि यंत्रों से खेत में मिला देंगे तो ये न केवल खाद का काम करेंगे बल्कि वातावरण प्रदूषित भी नहीं होगा। इस दौरान मुनीश लेहरवान ने अवशेष प्रबंधन की विधियां बताईं। डॉ. सतीश कुमार ने बताया कि करनाल क्षेत्र में लहसुन की खेती करना सबसे उपयुक्त है। पराली का मल्च के रूप में खेत में प्रयोग करते हुए लहसुन की खेती की जा सकती है। इसके अलावा इसे मशरूम उत्पादन में भी प्रयोग किया जा सकता है। डॉ. राजकुमार ने बताया कि इस योजना को जिला स्तर पर किसानों के खेतों में प्रभावी ढंग से लागू करने हेतु कृषि विज्ञान केंद्र प्रमुख रूप से कार्य कर रहे हैं।
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