भारत में सभी दुधारू पशु नस्लों की दुग्ध दैहिक कोशिकाओं (सोमैटिक सेल्स) की गणना की जाएगी। जैव प्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने यह जिम्मा हरियाणा स्थित राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) करनाल को दिया है।
एनडीआरआई के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार डांग पिछले करीब 15 वर्ष से दुधारू पशु नस्लों के सोमैटिक सेल्स की गणना पर काम कर रहे हैं। अब तक मुर्राह भैंस, गायों में साहिवाल, थारपारकर व संकर नस्ल गाय के दूध पर शोध पूरा हुआ है। इनके दूध के सोमैटिक सेल्स का मानक निर्धारित किया गया है। डॉ. डांग ने बताया कि मुर्राह भैंस के प्रति मिलीलीटर दूध में एक लाख श्वेत कोशिकाएं उचित हैं।
थारपारकर गाय के दूध में 1.25 लाख, साहिवाल गाय के दूध में 1.50 लाख, संकर गाय के सामान्य दूध में 1.50 से दो लाख तक होना उपयुक्त होता है। इनके ज्यादा होने पर दूध की संरचना में अंतर आ जाता है। किसी भी स्तन ग्रंथि संक्रमण से दूध में इन कोशिकाओं में वृद्धि होती है और उत्पादित दूध के खराब होने का संकेत मिलता है।
दूध में अधिक सोडियम क्लोराइड, प्रोटीन व श्वेत कोशिकाएं आती हैं। संक्रमित गायों के दूध में लैक्टोज के प्रतिशत में कमी देखी गई है। अनुसंधान ने संकेत दिया है कि इससे खराब दही, कम पनीर की उपज व डेरी उत्पादों के तकनीकी गुणों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
दैहिक कोशिकाएं शरीर की व्युत्पन्न कोशिकाएं जो सामान्य रूप से दूध में निम्न स्तर पर मौजूद होती हैं। दूध में आने वाली श्वेत रक्त कोशिकाएं सभी रक्त में पैदा होने वाली दैहिक कोशिकाएं हैं और रक्षा प्रणाली के हिस्से के रूप में काम करती हैं। यह दूध में लगातार कम मात्रा में आती रहती है। उनका प्राथमिक कार्य बीमारी से लड़ना और क्षतिग्रस्त उत्तकों की मरम्मत में सहायता करना है।