संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। राजस्थान के कलाकार लोक संस्कृति को संजीव किए हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में ये कलाकार कालबेलिया नृत्य लेकर पहुंचे हैं, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। लोक कला कालबेलिया की बीन बाजे की धुन के साथ पर्यटक भी थिरक रहे हैं। कालबेलिया नृत्य सांप की तरह लचकदार गति और खूबसूरत पोशाकों के लिए जाना जाता है, जो अक्सर महिलाएं करती हैं।
कालबेलिया नृत्य को 2010 में केन्या के नैरोबी में यूनेस्को की ओर से अमृत सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया गया। इसी कालबेलिया समाज की गुलाबो सपेरा को उनके कालबेलिया नृत्य के उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। बीन बाजा पार्टी के सपेरों की पारंपरिक पोशाक, बीन, चिमटा, ढोलक, तुम्बी आदि वाद्य यंत्रों की धुन ने दर्शकों का मन मोह लिया। इसी बीन की धुन में महोत्सव में आने वाले पर्यटक मदमस्त होकर नृत्य कर रहे हैं।
कलाकार बताते हैं कि बीन बजाकर सांपों के खेल दिखाना सपेरों का मुख्य पेशा था लेकिन वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत सांपों को पकड़ना अवैध है, जिसके चलते अपनी पारंपरिक कला के माध्यम से आजीविका नहीं कमा पा रहे हैं। इसलिए अपनी आजीविका के लिए शादी-विवाहों और अन्य उत्सवों पर बीन बजाकर अपना पेशा चला रहे हैं लेकिन आधुनिक युग की चकाचौंध व डीजे जैसे वाद्य मशीनरी के आगे बीन बजाना फीका पड़ गया है।
यह पारंपरिक कला लुप्त होने की कगार पर है। समाज अगर आधुनिक डीजे जैसे सिस्टम को त्यागकर शादी-विवाहों में बीन बाजा पार्टी को बुलाए तो इनकी जीविका आसान हो जाएगी।