- साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से आतंकवाद पर साधा निशाना
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। साहित्यिक मंच मन की उड़ान की ओर से एमडीडी बाल भवन में आयोजित कवि सम्मेलन में कवियों ने अपनी रचनाएं पेश कर वाहवाही लूटी। कवयित्री डॉ. कांता वर्मा ने आतंक के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार कुछ यूं किया- गुस्से के अब बांध बना दो थर-थर कांपे लाहौर कराची, दुश्मन को अब धर्म बता दो...।
मन की उड़ान मंच के संस्थापक रामेश्वर देव ने कहा- लहू टपकता है आंखों से अंतड़ी फड़कती है, जब पत्नी की मांग और मां की गोद उजड़ती है। शायर इकबाल पानीपती ने कहा-न हिंदू मुस्लिम न सिख ईसाई वो शक्ल-ए-इंसां में हैं दरिंदे, जहां में इकबाल बेगुनाहों का खूं जो नाहक बहा रहे हैं। युवा शायर आशीष ताज बोले-नफरतों को शर्म से शर्मसार होना चाहिए, आदमी को आदमी से प्यार होना चाहिए...।
इस काव्य की शुरुआत कुमारी खुशबू ने सरस्वती वंदना से की। कार्यक्रम की अध्यक्ष साबिर ख़ान ने कहा, हमें देश की एकता और भाईचारे को बढ़ावा देना है जिससे आतंकियों के मंसूबे सफल न हो सकें। मुख्य अतिथि शायर डॉ. एसके शर्मा ने माहौल को खुशनुमा बनाने की कोशिश की- बे इरादा नजर उनसे टकरा गई, जिंदगी में अचानक बहार छा गई। कवयित्री अंजू शर्मा ने महिलाओं का आह्वान किया- माता और बहनों को लक्ष्मीबाई बनना होगा, युद्ध भूमि में शत्रु को मार भगाना होगा...।
गुरमुख सिंह वडैच ने सवाल किया- जनाजे को मेरे रुकवा के बोले, ये लौटेंगे कब तक कहां जा रहे हैं। कवयित्री सुषमा चोपड़ा ने चिरागों की जुबां खोली-हमेशा दूसरों को रोशनी दिया करते, चिराग अपने लिए तो नहीं जला करते...। डॉ. श्याम प्रीति ने कहा कि करो प्रतीक्षा खेलने की उम्र में बच्चे को, शादी में कभी नहीं जकड़ा जाएगा। शायर अशोक मलंग ने वादियों का माहौल बताया- गमगीन आज आलम जन्नत की वादियों में, पसरा हुआ है मातम जन्नत की वादियों में। इस मौके पर डॉ. बलदेव सिंह, सुरेंद्र कल्याण, कुमारी भूवी ने भी प्रस्तुति दी। साहित्यिक कार्यक्रम में गोपाल दास, नवीन कुमार, देव, शीला रानी, गुरमीत सिंह मौजूद रहे।