- 37 साल बाद आईआईडब्ल्यूबीआर के वैज्ञानिकों ने नई किस्म की ईजाद
- हृदय, लीवर व मधुमेह समेत कई रोगों की संभावनाओं को दूर करेगा इस जाैं का सेवन
देव शर्मा
करनाल। भारतीय गेहूं एवं जौं अनुसंधान संस्थान (आईआईडब्ल्यूबीआर) ने करीब 37 सालों के बाद छिलका रहित जौं की नई किस्म तैयार की है। इस किस्म की चपाती, पूड़ी, दलिया तो स्वादिष्ट होगा ही, साथ ही इसमें कई औषधीय गुण भी होंगे, जो मधुमेह, बढ़े कोलेस्ट्राॅल, हृदय और यकृत (लीवर) रोगों के निदान में बेहद फायदेमंद साबित होंगे। साथ ही इसके सेवन से गुर्दे में पथरी बनने की संभावना भी कम रहेंगी। संस्थान ने छिलका रहित जौं की इस किस्म के सफलतापूर्वक सभी परीक्षण पूरे करने के बाद इसे केंद्र सरकार की रिलीज कमेटी को भेज दिया है। संभवत जल्द ही सरकार इस किस्म को रिलीज कर सकती है।
देश में 1989 में छिलका रहित जौं की एक किस्म आई थी। उसके बाद अब इस नई किस्म को वैज्ञानिकों ने तैयार किया है। आईआईडब्ल्यूबीआर के मुख्य अन्वेषक (जौं सुधार) डॉ. ओमबीर सिंह ने बताया कि वैज्ञानिक शोधों से पता चला है कि अधिक ग्लूटन आंतों में घाव पैदा करता है। रक्त के अंदर आंत से बिना फिल्टर हुए भोजन के कण टाॅक्सिस, वायरस, बैक्ट्रीरिया, फंगस आदि खून में प्रवेश कर जाते हैं। जो ऑटो इम्यून, कैंसर, लीवर डिजीज, ब्रेन डिजीज, शुगर (मधुमेह), कोलेस्ट्राॅल को बढ़ाता है। प्रतिरोधक क्षमता को भी कम करता है। शोधों से ये पता चला है कि जौं का वीटा ग्लूकॉन आंत के घाव को भरता है, मधुमेह, कोलेस्ट्राल, लीवर, दिमागी रोगों को कम करता है, साथ ही ये न्यूरो रक्षक, यकृत रक्षक होने के साथ-साथ गुर्दे में पथरी नहीं बनने देता है। सबसे खास बात यह है कि ये व्यक्ति को प्रसन्न रखता है, क्योंकि खुश रखने वाले हार्मोन सेरेटोनिन स्वस्थ आंत में ही पैदा होता है।
उधर ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआई) किसी खाद्य पदार्थ के कार्बोहाइड्रेट की मात्रा और रक्त शर्करा पर पड़ने वाले प्रभाव को मापने का तरीका होता है। खास तौर पर इसे रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ग्लाइसेमिक सूचकांक में सभी अनाज का ग्लाइसेमिक इंडेक्स 55 से 80 होता है जबकि जौं का ग्लाइसेमिक सूचकांक 25 से 30 होता है। मोटा अनाज (मिलेट्स) में ये 55 से अधिक होता है। जई (ओट) में भी 55 से ऊपर है। दलहनी फसलों का भी इससे अधिक होता है। गेहूं व चावल में ग्लाइसेमिक सूचकांक 60 से ज्यादा होता है। संस्थान के वैज्ञानिक दरअसल छिलका रहित जौं की दो नई किस्मों पर शोध कर रहे हैं। इनमें एक नई किस्म का शोध पूरा हो चुका है। सभी परीक्षण सफल रहे हैं। दूसरी नई किस्म 2025 तक किसानों को मिलने की संभावना है।
प्रोटीन सर्वाधिक, ग्लूटन गेहूं से आधा है : डॉ.ओमबीर सिंह
छिलका रहित जौं की इस नई किस्म में वीटा ग्लूकॉन (पानी में घुलनशील फाइबर) 6 से 8 प्रतिशत है। प्रोटीन की मात्रा 12 प्रतिशत से अधिक है जबकि इसमें ग्लूटन गेहूं से आधा है। आयरन 44 पीपीएम और जिंक 48 पीपीएम (पार्ट पर मिलियन), ये अब तक सभी रिलीज गेहूं व जौं की किस्मों में सर्वाधिक है। इस नई किस्म को हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लिए रिलीज किया जा सकता है।
डॉ.ओमबीर सिंह, मुख्य अन्वेषक (जौं सुधार), भारतीय गेहूं एवं जौं अनुसंधान संस्थान, करनाल।