फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Karnal News: थनेला बीमारी को जड़ से खत्म करेगा एनडीआरआई का शोध

विज्ञापन
विज्ञापन
माई सिटी रिपोर्टर
विज्ञापन

करनाल। दूधारू पशुओं की थनेला (मैस्टाइटिस) बीमारी से पशुपालकों को जल्द राहत मिल सकती है। आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) में इस बीमारी पर शोध किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का दावा है कि कोशिका के स्तर पर इलाज के लिए किए जा रहे शोध से थनेला रोग का स्थायी और जड़ से समाधान निकाला लाएगा।
एनडीआरआई के वैज्ञानिकों के अनुसार थनेला बीमारी खासकर अधिक दूध देने वाले पशुओं में पाई जाती है। यह रोग न केवल पशु के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है बल्कि दूध उत्पादन घटने से पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। एनडीआरआई के वैज्ञानिकों ने पशुपालकों को अहम सलाह देते हुए बताया कि थनेला रोगी पशु का दूध निकालने के बाद उसे कुछ देर तक बैठने न दिया जाए। इस दौरान पशु के थनों के छिद्र खुले रहते हैं, जिससे जमीन या गंदगी में मौजूद बैक्टीरिया आसानी से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। जब थन पूरी तरह सिकुड़ जाएं, तभी पशु को बैठने देना सुरक्षित होता है।
विज्ञापन

एनडीआरआई के निदेशक डॉ. धीर सिंह के मुताबिक पशु जहां बैठता है, वहां स्वच्छता बेहद जरूरी है। गंदगी और बैक्टीरिया वाले स्थान पर बैठने से संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। चूंकि दूध निकालने के बाद पशुओं के थन के छिद्र ज्यादा खुले रहते हैं। जैसे ही पशु बैठता है तो उन छिद्रों से बैक्टीरिया के आसानी से पशु के शरीर में प्रवेश करने की संभावनाएं बनी रहती हैं। अगर पशुओं के आसपास नियमित सफाई और उन्हें सही आहार दिया जाए तो पशुओं को थनेला से बचाव में अहम भूमिका निभाता है।

चारे और पोषण की भूमिका अहम
उन्होंने बताया कि ज्यादा दूध देने वाले पशुओं को संतुलित और पौष्टिक चारा देना बेहद जरूरी है। कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले पशुओं में थनेला रोग जल्दी पनपता है। सही आहार, फीड और नियमित देखभाल से इस बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है। पशुओं की नियमित जांच, थनों की सफाई, दूध निकालने से पहले और बाद में स्वच्छता, तथा पशु शेड की साफ-सफाई से थनेला बीमारी के प्रसार पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
-थनेला रोग
थनेला दुधारू पशुओं गाय, भैंस, बकरी में होने वाला एक गंभीर रोग है। इसमें थन (स्तन ग्रंथि) में सूजन, दर्द और गर्मी आ जाती है। पशुओं के दूध की गुणवत्ता खराब होने लगती है। थक्के, खून या पस बनने लगता है। दूध उत्पादन घट जाता है। पशु खाना-पीना छोड़ने लगता है। ये बीमारी मुख्य रूप से बैक्टीरिया के संक्रमण, चोट या गंदगी के कारण होती है। समय पर इलाज न मिलने पर पशु को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। प्रदेश में माना जाता है कि इस बीमारी के बाद पशु ठीक नहीं हो पाते।
विज्ञापन


थनेला बीमारी पर चल रहे इस शोध के नतीजे जल्द सार्वजनिक किए जाएंगे, जिससे देशभर के पशुपालकों को आधुनिक और वैज्ञानिक उपचार की सुविधा मिल सकेगी। यह शोध डेयरी सेक्टर के लिए एक बड़ी उपलब्धि साबित हो सकता है। -धीर सिंह, निदेशक, एनडीआरआई
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें