चिलचिलाती धूप झुलसा रही है तो गर्म सड़क जला रही है, पैरों में छाले हैं, थकान से बदन चूर है, खाने का भी कोई ठिकाना नहीं है, लेकिन आंखों में एक ही मंजिल है, अपना आशियाना। जितना जल्दी हो सके अपनों के पास पहुंचने की चाहत न जाने कैसे हौसला दे रही है, जिससे हर गम को दरकिनार कर पैदल ही कदम बढ़ते जा रहे हैं। इनमें महिलाएं भी हैं, जो अपने लाड़लों को गोद में उठाए हैं, सिर पर गृहस्थी की पोटली भी है। देश में आजादी के बाद करनाल जिले से मेरठ और दिल्ली की ओर जाती सड़कों पर दिखने वाला यह मंजर एयर कंडीशन कक्षों में बैठकर प्रवासियों को उनके घरों तक पहुंचाने का दावा करने वाले सरकारी तंत्र पर सवालिया निशान लगा रहे हैं।
ऐसा भी नहीं है कि जिला प्रशासन कुछ कर नहीं रहा है, बड़ी संख्या में प्रवासियों को उनके घरों पहुंचाया जा रहा है, लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरा समान है। पंजाब और हरियाणा राज्य के विभिन्न जिलों से उत्तर प्रदेश, बिहार आदि राज्यों को रवाना होने वाले श्रमिकों की संख्या में अभी कोई कमीं नहीं आ रही है। यह श्रमिक इंटरनेट की दुनियां से दूर हैं, इन्होंने ना तो कोई रजिस्ट्रेशन कराया है और ना ही किसी अधिकारी से मदद मांगने गए हैं। इन्हें तो बस इतना मालूम है कि महीनों हो गए, काम नहीं मिल रहा है। अब लॉकडाउन शायद फिर बढ़ने की संभावना है, आखिर अब यहां रहकर क्या खाएंगे, क्या पीयेंगे और कहां रहेंगे ? यही तीन यक्ष प्रश्न हैं जो प्रवासियों को पलायन करने पर विवश कर रहे हैं। सरकारी तंत्र इन श्रमिकों तक नहीं पहुंच पा रहा है। ना तो इनके रहने की व्यवस्था हो रही है और ना ही इनके खाने पीने की। अब चंद समाजसेवी संस्थाएं ही रह गईं हैं जो सेवा में लगी है, अन्य संस्थाओं का समाजसेवा का जोश करीब करीब ठंडा हो चुका है।
हरियाणा-यूपी बार्डर पर पुलिस ने दौड़ाया, फिर वापस करनाल लाए
-पांच दिन पहले पंजाब राज्य से पैदल चले अखिलेश कुमार और हाकिम यादव के साथ कुल 70 लोग हैं। जिन्हें बिहार के गोपाल गंज जाना है। यह कई महीनों से पंजाब के विभिन्न स्थानों पर कपड़ा कारोबार में सिलाई, बुनाई का काम करते हैं। लेकिन दो महीने से काम बंद होने के कारण मालिक ने इन्हें निकाल दिया है। जो धन कमाया था, वह दो महीने में खा चुके हैं। अब ना तो रुपये हैं और ना ही खाने पीने का सामान। समाजसेवी संस्थाएं कभी कभार एक वक्त की रोटी दे देती है लेकिन बच्चों को दूध भी चाहिए, चाय भी चाहिए, वह तो नहीं मिल रहा है, बच्चे कैसे जीयें। जब सरकारी तौर पर कोई व्यवस्था नहीं हुई तो पैदल ही अपने घरों की सफर पर निकल पड़े हैं, पांच दिन बाद करनाल आए, शनिवार को पैदल चलकर यूपी बार्डर पर गांव बिड़ौली के पास यमुना नदीं के पुल पर पहुंचे लेकिन यहां मधुवन थाना पुलिस ने उन्हें डंडा लेकर दौड़ा लिया। लेकिन मजदूर रोड के किनारे बैठ गए। करीब पचास से अधिक मजदूर और आ गए। अधिक संख्या होने के कारण जिला प्रशासन को सूचना दी गई तो यहां सरकारी डाक्यूमेंट्री बनाने वाली टीम भी पहुंच गई। बाद में इन सभी श्रमिकों को बसों व अन्य गाड़ियों से करनाल के राधा स्वामी सत्संग भवन लाया गया। यहां मौजूद उपनिरीक्षक पवन कुमार ने बताया कि सत्संग भवन में इनके रहने खाने की व्यवस्था की जाएगी। वहां से रजिस्ट्रेशन कराने के बाद इन्हें इनके राज्यों को भेजा जाएगा।
-बिहार के बेगूसराय व खगड़िया जिले के नौ श्रमिक पैदल ही करनाल शहर से होकर दिल्ली की ओर जाते मिले। दोपहर करीब 12.30 बजे चिलचिलाती धूप में भी सड़कों को नापते उनके कदम रुक नहीं रहे हैं। गुड्डू, रवि कुमार, हरे राम, रुपेश, अगतजीत सिंह, रंकज कुमार, सुधीर कुमार ने बताया कि उनकी मंजिल करीब 1400 किमी है। हाथ में मोबाइल फोन है, गूगल मैप के जरिये वह रास्ता खोजते हुए अपने घरों की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन मेरठ रोड पर यमुना नदी को पार करना मुश्किल हो जाता है, वहां पुलिस खदेड़ देती है, इसलिए वह दिल्ली होकर आगे जाएंगे। वह लोग तरावड़ी में लंबे समय से काम कर रहे थे लेकिन अब काम खत्म हो गया है। खाली बैठे हैं। यहीं पर रहे तो कोरोना से पहले तो वह भूख से ही मर जाएंगे। नहीं पता कि आगे कितनी मुश्किलें आएंगी लेकिन जो भी होगा, देखा जाएगा। हम घर ही तो जा रहे हैं, कोई गलत काम तो नहीं कर रहे हैं।
कुछ ऐसे भी समाजसेवी
-जिस समय बिहार के यह मजदूर अपने घरों की ओर बढ़ रहे थे, इसी समय करनाल अनाज मंडी के आढ़ती राज कुमार ने अपनी कार रोकी और उतर कर सभी श्रमिकों को 200-200 रुपये दिए। कहा रास्ते में कुछ खा लेना। यदि प्रशासन इजाजत दे तो हम आप लोगों को अपने वाहनों से आपके घर पहुंचा दें, लेकिन इसकी इजाजत नहीं है।
जाने की ठान ली है तो कोई रोक नहीं पाएगा
-करनाल से मेरठ रोड पर दोपहर करीब 1.30 बजे कड़ाके की धूप के बीच कुछ पेड़ों के नीचे साइकिल सवार प्रवासी श्रमिक आराम करते मिले। इसमें रमेश कुमार ने बताया कि वह और उसके छह अन्य साथी लुधियाना में हौजरी में काम करते थे। लेकिन महीने भर तो मालिक किसी तरह खाने की व्यवस्था करता रहा लेकिन लॉकडाउन बढ़ता रहा तो बीस दिन पहले ही उसने मना कर दिया। घर जाने को कह दिया। सभी अयोध्या के मिल्की क्षेत्र के रहने वाले हैं। सभी ने साइकिलें संभाली, एक पंप खरीदा और पंचर जोड़ने का सामान और चल पड़े अपने आशियानों की ओर। करनाल में गुरुद्वारे में खाना खाया, धूप तेज हो गई, थकान भी बहुत है, इसलिए रोड के किनारे पेड़ों की छांव में गमछा जमीन पर बिछाया और प्रकृति गोद में आराम करने लगे। मालूम नहीं कब पहुंचे, आगे खाना मिलेगा या नहीं लेकिन जो भी, घर तो जाना ही है। रही बात पुलिस की तो पंजाब से यहां तक आ गए हैं तो आगे भी निकल ही जाएंगे।
-यूपी में गोंडा के पांच परिवार, जिनमें जिनमें चार महिलाएं, दो युवतियां व तीन दुधमुंहे बच्चों सहित करीब बारह लोग शामिल हैं, यह सभी लोग लुधियाना मे रहकर रिक्शा चलाने व रेहड़ी पर सामान बेचने का काम करते थे। लेकिन काम बंद हो गया तो घर के लिए निकल पड़े। मंजिल बहुत दूर है, ना तो समय का पता है और ना ही रास्तों का लेकिन पैदल ही हर कोई कदम बढ़ा रहे है। कहीं कोई दुकान पड़ती है तो बच्चे के लिए दूध मांग लेते हैं। कहीं रास्ते में कोई खाना खिला देता है तो खा लेते हैं। धूप लगती है, पेड़ों की छांव का सहारा लेते हैं, थकते हैं तो इन्हीं पेड़ों की छांव में बैठकर कुछ आराम कर लेते हैं और फिर चल लेते हैं। लेकिन अब पुलिस आगे नहीं जाने दे रही है। इन परिवारों का कहना है कि हम ना तो किसी से कुछ ले रहे हैं और ना ही दे रहे हैं, कम से कम हमें अपने घर तो जाने दो।
-तपती दोपहरी में व्याकुल नौनिहाल तो जब दूध नहीं मिला तो वह रोने लगा। बेबश मां को जब कुछ नहीं सूझा तो उसे लेकर एक पेड़ की छांव में बैठ गई। घास पर अपने लाड़ले को बैठाकर उसे चुप कराने का प्रयास करने लगी। लेकिन नौनिहाल की आंखें, अपनी मां से यह सवाल कर रही थी कि मां, इसमें मेरा कसूर क्या है ?
बिहार और यूपी में भी कोरोना संकट बढ़ने की आशंका
-बड़ी संख्या में श्रमिक उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों को लौट रहे हैं, जो श्रमिक जिला प्रशासन के माध्यम से जा रहे हैं, उनका तो टेस्ट हो रहा है लेकिन भारी सख्या ऐसे श्रमिकों की है जो किसी न किसी तरीके से बिना जांच के ही यूपी, बिहार की सीमा में प्रवेश कर रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में जो लोग अपने घरों के लौट रहे हैं, यदि वह कोरोना पाजिटिव हुए तो सरकारों के सामने मुश्किल हो जाएगी। क्योंकि यह प्रवासी, जो घरों को लौटने के लिए किसी भी हद से गुजरने को तैयार है, वह ना तो सोशल डिस्टेंसिंग कर रहे हैं और ना ही सैनिटाइजर रखते हैं। इनमें अधिकांश तो मास्क भी नहीं लगा रहे हैं।