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मौसम की मार से 56 हजार किसानों को 624 करोड़ का फटका

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मौसम की मार से इस बार किसान कराह उठा है। जिले के करीब 56 हजार से अधिक किसानों के खेतों में करीब 31 लाख क्विंटल गेहूं का उत्पादन कम हुआ है, जिसकी कीमत एमएसपी के हिसाब से लगभग 624 करोड़ रुपये होती है। इस कारण किसान तो अपनी फसल से बेजार है ही, अनाज मंडियों में समय से पहले पसरा सन्नाटा भी इसकी गवाही दे रहा है। आढ़तियों और श्रमिकों की आय भी प्रभावित हुई है। यही कारण है कि कई किसान संगठन अब सरकार से गेहूं पर बोनस देने की मांग करने लगे हैं।
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खेतों में गेहूं के कम उत्पादन को दो आंकड़ों से समझा जा सकता है। पहला सीधा आंकड़ा ये है कि पिछले साल गेहूं खरीद सत्र 2021-22 में जिले की सभी अनाज मंडियों में कुल 9.12 लाख एमटी यानी 9120000 क्विंटल गेहूं खरीदा गया था, लेकिन इस बार 26 अप्रैल की शाम तक सिर्फ 5941337 क्विंटल गेहूं खरीदा गया। मंडी में रोजाना की खरीद 25 से 26 हजार क्विंटल तक आ गई। यदि कुल खरीद को 60 लाख क्विंटल के आसपास मान लिया जाएगा तो भी इस बार करीब 31 लाख क्विंटल गेहूं मंडियों में कम आया है।
दूसरा तरीका ये है कि जिले के कुल 56320 किसानों ने कुल 445177 एकड़ जमीन का गेहूं की फसल के लिए पंजीकरण कराया है। 445177 एकड़ जमीन में यदि 24 क्विंटल प्रति एकड़ पैदावार मानी जाए तो कुल पैदावार 10684248 क्विंटल होनी चाहिए थी, लेकिन किसानों के अनुसार 17 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन हुआ है। 17 क्विंटल की दर से कुल उत्पादन 7568009 क्विंटल हुआ। जिसका अंतर 3116239 क्विंटल होता है। यानी दोनों ही आंकड़ों से किसानों को करीब 31 लाख क्विंटल गेहूं का सीधा घाटा दिख रहा है। एमएसपी के 2015 रुपये की प्रति क्विंटल की दर से इसकी कीमत 624.65 करोड़ रुपये बनती है। किसानों का मानना है कि गेहूं उत्पादन में कमी का लगभग यही आकड़ा प्रदेश के अन्य जिलों में भी है।
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इसमें दो राय नहीं है कि गेहूं का उत्पादन प्रभावित हुआ है, पिछले साल 9.12 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद हुई है, इस बार छह लाख मीट्रिक टन भी अभी नहीं पहुंच पाई है और गेहूं खरीद का सीजन खत्म होने की ओर है। खेतों में 30 से 35 प्रतिशत कम उत्पादन की बात सामने आ रही है।
- वीरेंद्र सिंह, खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले नियंत्रक, करनाल
वर्जन
किसानों की फसल पर ही प्रदेश भर की मंडियों में बैठे हजारों आढ़तियों व श्रमिकों की आय भी निर्भर है। जितना अधिक गेहूं मंडियों में आता है, उतनी अधिक आढ़त होती है, उतनी अधिक श्रमिकों को मजदूरी मिलती है। करीब 35 से 40 प्रतिशत कम गेहूं मंडियों में आया तो आढ़तियों को भी उसी के अनुसार बड़ा घाटा हुआ है। कई राज्यों से यहां मजदूरी करने प्रवासी श्रमिक आते हैं, इस बार भी वह निराश हैं।
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- रजनीश चौधरी, स्टेट चेयरमैन हरियाणा राज्य अनाज मंडी आढ़ती एसोसिएशन
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