संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। जिला नागरिक अस्पताल में गर्भवती महिलाओं में आयरन की समस्या सबसे ज्यादा आ रही है। आयरन शरीर में हीमोग्लोबिन के निर्माण में मदद करता है। हीमोग्लोबिन खून में ऑक्सीजन को पूरे शरीर में और गर्भ में पल रहे बच्चे तक पहुंचाने का काम करता है। गर्भावस्था के दौरान खून की आपूर्ति 50 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। नागरिक अस्पताल की ओपीडी में 40 से 50 फीसदी गर्भवतियों आयरन की कमी मिल रही है।
जिला नागरिक अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. वैशाली वर्मा कहती हैं कि गर्भावस्था के दौरान आयरन का चौथे महीने से ही सेवन शुरू कर देना चाहिए। आयरन की कमी से मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ सकता है। आयरन न केवल मां बल्कि बच्चे के विकास के लिए भी अनिवार्य होता है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को आयरन की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। आयरन की कमी से एनीमिया हो सकता है।
इससे थकान, कमजोरी, चक्कर आना और प्रसव के दौरान गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं। गर्भावस्था के दौरान खून की कमी होना काफी चिंता का विषय है। यदि महिलाओं में आयरन की कमी होती है तो इससे बच्चे पर असर पड़ता है। आयरन की कमी होने से बच्चे का सामान्य से कम वजन होना, कम बौद्धिक विकास में मानसिक और शारीरिक विकास सही से ना होने की समस्या रहती हैं वहीं इससे बच्चे की गर्भ में मौत भी हो सकती है।
प्रसव के दौरान अधिक खून बहने का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टर की सलाह लेकर आयरन की खुराक लें। प्रसव होने के बाद भी छह महीनों तक आयरन का सेवन करना चाहिए। इससे मां और बच्चा स्वस्थ रहते हैं। आयरन युक्त सब्जियां, दालें, फलों का और विटामिन सी का सेवन करें। सरकार गर्भवती महिलाओं को निशुल्क आयरन की सप्लीमेंट अस्पताल और आंगनबाड़ी केंद्रों में उपलब्ध कराती है।