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अवैध रूटों पर बेखौफ दौड़ रही सहकारी समिति की बसें

Thu, 12 Sep 2013 11:06 PM IST
करनाल
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जिलेभर की अधिकतर सहकारी समिति की बसें आउट ऑफ रूट दौड़ रही हैं। इससे न केवल सरकार के नियमों की धज्जियां सरेआम उड़ रही है, बल्कि सरकार को सालाना करोड़ों रुपये के राजस्व का रगड़ा भी लगाया जा रहा है।
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सहकारी समिति की बसों के आउट ऑफ रूट होने से यात्रियों के लिए जोखिम और फजीहत और बढ़ जाती है। ग्रामीणों की मानें तो पूरा गोरखधंधा अधिकारियों से सांठगांठ के बल पर चल रहा है। निर्धारित रूटों पर बसें नहीं पहुंचने पर अवैध वाहन चालकों की भी पौबारह हो रही है।  

ये कहता है रिकॉर्ड
राज्य परिवहन के सरकारी रिकॉर्ड पर निगाह डाली जाए तो 68 बसें करनाल में सहकारी समिति की चल रही हैं। इनमें से कई बसें खराब हैं तो कई दुर्घटनाओं के मामलों में कानूनी प्रक्रिया में उलझी होने के कारण अपने रूट पर नहीं है। पचास से साठ के मध्य सहकारी समिति की बसें करनाल के विभिन्न ग्रामीण रूटों के लिए लगाई गई हैं।
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यह आंकड़ा मात्र एक दिखावा है। हकीकत कुछ और है। इस हकीकत से पर्दा उठाया जाए तो न केवल तमाम बसें अपने निर्धारित रूटों पर लौट आएंगी, बल्कि कई अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ जाएगी। सांठगांठ कर अवैध रूटों पर बसों को चलवाने वाले अधिकारियों की जेब भारी होना बंद हो जाएगी।

आउट ऑफ रूट चलने वालों के हौसले बुलंद
सूत्रों की मानें तो करीब तीस से अधिक करनाल सहकारी समिति की बसें धड़ल्ले से अपने रूट को छोड़ ऑउट ऑफ रूट हैं। बस संचालकों के हौसले इतने बुलंद हैं कि सबसे अधिक चलने वाले हाईवे नंबर एक के रूट करनाल से पानीपत और करनाल से कुरुक्षेत्र पर बेरोकटोक बसें दौड़ा रहे हैं।

करनाल से निसिंग, करनाल से असंध समेत कई अन्य रूट भी ऐसे हैं, जिन पर सहकारी समिति की काफी बसें अवैध तौर पर चल रही है। इससे न केवल सरकार को महीने का लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है, वहीं, यह घाटा पूरे वर्ष में करोड़ों रुपये में तब्दील हो जाता है। उधर, बसों के संचालक और अधिकारी इस धंधे से लाखों रुपये कमाने में लगे हैं।

बसों के अभाव में दिक्कतें
ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की बात पर यकीन किया तो उन लोगों की बसों के अभाव में बुरी फजीहत होती है। लोग समय पर अपने काम धंधों पर नहीं पहुंच सकते। स्कूल, कॉलेज के विद्यार्थी तो ग्रामीणों से भी अधिक दिक्कत रहते हैं। विद्यार्थी के अनुसार बसें रूट पर नहीं आती। सरकारी बस वहां चलती नहीं।

 वे लोग अपने स्कूल, कॉलेज समय पर नहीं पहुंच सकते। जिले के गांव इच्छनपुर के लोगों की बात सुनें तो वे लोग पिछले करीब दो साल से इस रूट पर बस चलाने की मांग कर रहे हैं। कोआपरेटिव सोसाइटी की बसों का रूट होने के बावजूद सहकारी बसों के संचालक बदनारा में ही इच्छनपुर के यात्रियों को उतार देते हैं। यात्रियों को दो किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है।

बच्चों और वृद्धों की बुरी फजीहत हो जाती है। सिर पर भारी सामान उठाकर चलने वाली महिलाआें की दुर्गति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। इच्छनपुर के सरपंच दलजिंदर सिंह लाडी के अनुसार उनके गांव में बसें नहीं चलने से लोगों को भारी परेशानी है। यह दिक्कत दूर हो गई तो ग्रामीणों को काफी राहत मिलेगी।

नोटिस में मामला आया तो कार्रवाई
53 बसेें सड़कों पर दौड़ रही हैं। कई बसें कानूनी प्रक्रिया के कारण कई मामलों में उलझी होने के कारण रूट पर नहीं है। बसों की कमी जरूर है। हां, सहकारी समिति की बसें आउट ऑफ रूट हो जाती हैं। नोटिस में आते ही चेक किया जाता है। अगस्त महीने मेें ही आउट ऑफ रूट चलने के कारण 12 चालान किए गए हैं। अन्य बसों के नोटिस में आने पर कार्रवाई की जाएगी।
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डॉ. सुशील मलिक, डीटीओ, करनाल
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