जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बिजली उपभोक्ताओं के हक में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। आयोग ने उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम की ओर से एक उपभोक्ता को भेजे गए 1.45 लाख रुपये के भारी भरकम बिल को अवैध करार देते हुए उसे रद्द करने का आदेश दिया है। आयोग ने इसे विभागीय लापरवाही बताते हुए कहा कि अगर सिस्टम में तकनीकी खामी के कारण बिल नहीं बन पाए तो इसके लिए उपभोक्ता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
तरावड़ी निवासी अशोक कुमार ने आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनका बिजली मीटर वर्ष 2021 में बदला गया था। इसके बाद विभाग उन्हें लगातार औसत आधार पर बिल भेजता रहा जिसका वह नियमित भुगतान करते रहे। 10 अप्रैल, 2024 को उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम ने उन्हें एक लाख 45 हजार 585 का बिल थमा दिया। उपभोक्ता ने जब इसकी शिकायत की तो विभाग ने कोई सुनवाई नहीं की, जिसके बाद उन्होंने कानूनी रास्ता अपनाया।
बिजली निगम ने सुनवाई के दाैरान अदालत में तर्क दिया कि मीटर बदलने के बाद कंप्यूटर सिस्टम में तकनीकी दिक्कत (एसीओ जनरेट न होने) के कारण वास्तविक रीडिंग नहीं ली जा सकी थी। उन्होंने दावा किया कि मार्च, 2024 में ली गई रीडिंग के आधार पर कुल दो लाख 57 हजार 896 रुपये का बिल बना था। इसमें से उपभोक्ता ने पहले से कुछ राशि जमा करवाई है। कुल बने बिल में से उपभोक्ता की ओर से पहले जमा की गई राशि काटकर एक लाख 43 हजार 502 रुपये बकाया था।
उपभोक्ता को नोटिस नहीं भेजा
मामले में आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्यों ने सुनवाई की। आयोग ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। कहा कि विभाग यह साबित नहीं कर पाया कि बिल भेजने से पहले उपभोक्ता को कोई नोटिस दिया गया था। इसके अलावा पुराना मीटर हटाए जाने के करीब तीन साल बाद लैब में उपभोक्ता की अनुपस्थिति में जांचा गया। अगर सिस्टम में तकनीकी खामी के कारण बिल नहीं बन पाए तो इसके लिए उपभोक्ता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। आयोग ने बिजली निगम की इस कार्रवाई को सेवा में कोताही और अनुचित व्यापार व्यवहार माना।
उपभोक्ता का कनेक्शन नहीं काटें
अदालत ने निर्देश दिए कि एक लाख 45 हजार 585 रुपये की विवादित बिल की राशि और उस पर लगे जुर्माने की वसूली उपभोक्ता से न की जाए। इसके अलावा न ही इस बिल के आधार पर उपभोक्ता का कनेक्शन काटा जाए। शिकायत के दौरान उपभोक्ता की ओर से जमा कराई गई 20 प्रतिशत राशि को अगले बिलों में समायोजित किया जाए। आयोग ने इस फैसले को 45 दिनों के भीतर लागू करने के आदेश दिए हैं।