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Karnal News: साथी के पार्थिव शरीर को ढाल बना किया दुश्मन का मुकाबला

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करनाल। दुश्मन टाइगर हिल पर था, वह कितने थे, किस तरफ थे, इसका पता नहीं था लेकिन वो हमें देख सकते थे। हम टाइगर हिल के रास्ते में पड़ने वाले बैस कैंप पर थे, लक्ष्य था चोटी संख्या 4825 पर फतह पाना। दुश्मन गोलियों की बौछार कर रहा था। सीने पर गोली खाकर बहादुर साथी नायक बलवान सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए। उनकी सांसें थम चुकी थीं लेकिन दुश्मन उन्हें निशाना बनाकर लगातार गोलियां दागते रहे। हम अपने साथी के ही पार्थिव शरीर को ढाल बनाकर 3 दिन तक भूखे-प्यासे रहकर दुश्मन को जवाब देते रहे।
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कारगिल की जंग में दुश्मन के दांत खट्टे करने वाले बहादुर जवानों में शामिल रहे नायब सूबेदार (रिटायर्ड) बलराज सिंह ने इस शौर्य गाथा को सुनाया। उन्होंने बताया कि ऑक्सीजन कम थी, सांस फूल रही थी। हालात बहुत ही मुश्किल थे लेकिन यह ठान रखा था कि चाहे कुछ भी हो जाए, पर डटे रहना है। तीन दिन बाद आखिर में हमारे धैर्य और साहस की जीत हुई।
उन्होंने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान स्थितियां पूरी तरह विपरीत थीं। मई के महीने में कैप्टन शमशेर सिंह की अगुवाई में महावीर, ईश्वर सिंह, रनपाल, तीन जेसीओ और 96 सैनिकों के साथ जब टाइगर हिल के नीचे स्थित चोटी 4825 पर फतह पाने के लिए हम सभी निकले। ऊपर दुश्मन की गोली थी तो नीचे भी परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं। जिस जगह पर नायक बलवान सिंह वीरगति प्राप्त की, वहां दुश्मनों की नजर से छिपने के लिए कुछ नहीं था। तीन दिन तक नायब बलवान सिंह के शरीर पर गोलियां चलती रहीं, अनगिनत गोलियों से शरीर छलनी हो चुका था।
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बलराज सिंह ने बताया कि वह और उनका एक अन्य साथी इसी छलनी शरीर की आड़ लिए दुश्मनों का मुकाबला करते रहे। खाने की बात तो दूर तीन दिन तक पानी की एक बूंद भी मुंह में नहीं गई। जब नायक बलवान सिंह को पहली गोली लगी तो मैंने कहा कि वह नीचे चले जाएं लेकिन उन्होंने कहा कि वह साथियों को छोड़कर नहीं जाएंगे। इसी बीच कई गोलियां और लगी। तीन दिन तक दुश्मन यही समझता रहा कि वह जीवित हैं। जब चोटी 4825 के निकट पहुंचे तो दुश्मनों के भी हौसले पस्त हो चुके थे लेकिन फिर भी लगातार फायरिंग कर रहे थे। इसी बीच सुबह 4 बजे एयरफोर्स की कवर मिला और चोटी से दुश्मनों का सफाया करके तिरंगा फहरा दिया गया।
बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं थी

बलराज सिंह ने बताया कि उस समय कारगिल जैसे दुर्गम क्षेत्र में जंग लड़ना बहुत ही मुश्किल था। सेना के पास आज के मुकाबले बहुत ही कम संसाधन थे। सैनिक बगैर बुलेटप्रूफ जैकेट के दुश्मन की गोलियों का सामना कर रहे थे। हड्डी गला देने वाली ठंड से बचाने वाली स्नो यूनिफाॅर्म भी हमारे पास नहीं थी। करिगिल युद्ध विपरीत हालात में लड़ी गई सबसे मुश्किल जंग थी।

11 जवानों का बलिदान

बलराज सिंह ने बताया कि अभियान में हमारे एक जेसीओ और 10 जवानों का बलिदान हुआ था। इनमें करनाल के बल्ला गांव के गुलाब सिंह भी एक थे। जंग मई से जुलाई तक लड़ी गई।
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