करनाल। एफएसएल रिपोर्ट में इरादतन गायों को जहर देने की पुष्टि के बाद गोशाला में 45 गायों की मौत का पर्दाफाश तो हो गया लेकिन गोशाला संचालक समितियों और नगर निगम की भारी लापरवाही भी सामने आई है। क्योंकि गिरफ्तार आरोपियों ने पूछताछ में पुलिस को बताया है कि वह इससे पहले भी गोशाला में जाकर गायों को जहर देते रहे हैं। यदि वह उस दिन नशे में एक साथ अधिक गायों को जहर न देते तो शायद इन मौतों का सिलसिला अब भी नहीं थमता। अमर उजाला ने 10 फरवरी के अंक में खुलासा किया था कि इस मामले के तार हड्डी व खाल के धंधेबाजों से जुड़े पाए गए हैं।
सेक्टर 32-33 थाना प्रभारी रामफल सिंह ने बताया कि एफएसएल की रिपोर्ट में ये भी पता चला कि जहर चारे में नहीं था, बल्कि मारने के ही इरादे से अलग से दिया गया है। पुलिस ने सीसीटीवी खंगालने के साथ उस रात गोशाला में मोबाइल लोकेशन को ट्रैक किया तो पांच मोबाइल फोन की मौजूदगी वहां मिली। तभी गिरफ्तारी संभव हो सकी। इस मामले की जांच कर रहे सीआईए-2 के इंचार्ज मोहन लाल ने बताया कि पता चला कि शाहबाद की डेहा बस्ती के प्रधान ने मृत पशुओं को उठाकर खाल व हड्डी के कार्य का ठेका ले रखा है। उसके संपक के लोग करनाल में भी खाल व हड्डी का काम करते हैं।
ये भी जानकारी मिली कि करनाल की मंगल कॉलोनी का रजत अपने साथियों के साथ गोशाला नंदीग्राम से भी मृत पशुओं को उठाता है। जब इसे पकड़कर पूछताछ की गई तो इस पूरे गिरोह का भंडाफोड़ हुआ। बताते हैं कि शाहबाद की डेहा बस्ती निवासी विशाल पहले अंबाला में मृत पशुओं की हड्डी व खाल का धंधा करता था। जम्मू कश्मीर के झुग्गी झोपड़ी निवासी सूरज भी उसी के साथ था। जहर देने का काम सूरज ही करता था। इसी बीच विशाल ने डेहा बिरादरी के प्रधान से संपर्क कर मृत पशुओं की खाल हड्डी का ठेका लेने को कहा। उसने ठेका ले भी लिया। अपने रसूख का इस्तेमाल करके करनाल गोशाला में मृत गोवंश को उठाने का भी काम ले लिया। पूछताछ में बताया कि ये लोग पहले भी गोशाला में जाकर जहर देते थे लेकिन संख्या दो से पांच तक होती थी, 26 जनवरी की रात पांचों नशे में थे, इसलिए उन्होंने एक साथ 45 गायों को जहर दे दिया।
सवाल ये है कि गोशाला में बाहर के लोग आकर गायों को जहर देते रहे तो गोशाला प्रबंधन के लोग क्या कर रहे थे। गोशाला में रह रहे करीब 20 से 25 कर्मचारियों ने क्यों नहीं देखा। जब रोज गायों की मौत हो रही थी तो उनकी जांच क्यों नहीं कराई गई, क्यों गोशाला प्रबंधन ने उन्हें स्वाभाविक मौत बताकर जहर देने वालों को उनके शव सौंपे जाते रहे। गोशाला की चहारदीवारी तो है लेकिन टूटी है, कोई भी कहीं से भी अंदर जा सकता है। क्यों इसे दुरुस्त नहीं कराया गया। कई ऐसी लापरवाहियां हैं जो गोशाला से जुड़े पूरे प्रबंध तंत्र को ही सवालों में घेरे में खड़ा कर रही हैं। अभी एक आरोपी शाहबाद की डेहाबस्ती निवासी अमर फरार बताया जा रहा है।
क्या था मामला
26 जनवरी की रात एक घंटे के अंदर दो शेडों में 45 गायों की मौत हो गई थी। 27 जनवरी की सुबह जानकारी हुई तो गोशाला का संचालन कर रही बाबा बंसी वाला गोसेवा धाम के प्रबंधक राजेश बंसल ने हरी घास में विषाक्त पदार्थ का स्प्रे होने की आशंका जताते हुए ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर लिखा दी, लेकिन जब एफएसएल की रिपोर्ट आई तो उसमें स्पष्ट हुआ कि हरी घास में जहर नहीं था, जहर अलग से दिया गया है। जिसे तूड़ी आदि में पावर की शक्ल में मिलाया गया हो सकता है। तब पुलिस की जांच दूसरी ओर घूमी। इधर, नगर निगम ने भी तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित की लेकिन बाद में मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने मंडलायुक्त डॉ. साकेत कुमार की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित कर दी। जिसकी अंतरिम रिपोर्ट सरकार को भेज दी गई है।
रात के अंधेरे में निकलते थे जहर मिला गुड़ लेकर
- हरियाणा के करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला सहित कई जिलों व यूपी तक फैला है नेटवर्क
माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। गायों को जहर देकर मारने वाले हड्डी व खाल के धंधेबाज हर रोज रात के अंधेरे में बाइक पर सल्फास का पावडर मिला गुड़ लेकर निकलते थे। शहर से गांव तक जहां भी लावारिस गोवंश मिलता था तो उसे मीठा जहर खिला देते थे। सुनसान रास्तों पर गोवंश नहीं मिलने पर गोशाला का रुख करते थे। उसके घंटेभर बाद और गोशाला में सुबह गाड़ी लेकर पहुंचते थे। गोवंश के मरने के बाद उसे उठाकर ले जाते थे। एक गोवंश से उनकी करीब 10 से 15 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती थी। ये धंधा सिर्फ करनाल में ही नहीं बल्कि अंबाला, कुरुक्षेत्र सहित हरियाणा के कई जिलों में चल रहा था।
सीआईए-2 के प्रभारी मोहन लाल ने बताया कि पूछताछ में गिरफ्तार आरोपियों ने स्वीकार किया है कि गोशालाओं के साथ-साथ वह लावारिस घूमते पशुओं को निशाना बनाते थे। उन्हें मालूम है कि लोग लावारिस पशुओं से परेशान रहते हैं, इसलिए उनकी मौत पर कोई गंभीर नहीं होता है। गोवंश सल्फास की गोली चारे या घास में मिलाने पर नहीं खाते, इस कारण सल्फास की गोलियों के पावडर को गुड़ में मिलाकर खिलाते थे। जिससे कुछ ही देर में पशुओं की मौत हो जाती थी। वह लंबे समय से ऐसा करते आ रहे हैं। मृत पशुओं की एक खाल ही चार से पांच हजार, हड्डियां भी तीन से चार हजार रुपये, आंतें आदि करीब दो हजार यानि एक गोवंश से करीब 15 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती थी। यदि उन्होंने एक गोशाला या सड़क से पांच पशु भी मार दिए तो 75 हजार रुपये की कमाई एक ही दिन में हो जाती थी। ये भी जानकारी मिली है कि उनका नेटवर्क अंबाला, कुरुक्षेत्र सहित हरियाणा के कई राज्यों व उत्तर प्रदेश से भी फैला है।