करनाल। अंग्रेजी हुकूमत को गिराने के लिए हमारे क्रांतिवीर जितने इरादों के पक्के थे, उतने ही यातनाओं को सहने में कठोर भी साबित हुए। इनमें से ही एक थेे इंद्री के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी साधूराम, जिन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड से गुस्सा होने पर 1930 में करनाल से जुल्मों के खिलाफ चिंगारी सुलगाई थी।
1942 में जब अंग्रेजी हुकूमत के पंजाब गवर्नर को करनाल आना था, तो साधूराम के नेतृत्व में यहां के क्रांतिवीरों ने उन्हें बम से उड़ाने के योजना बनाई। अपने इरादे को पूरा करने के लिए क्रांतिकारी बम तो नहीं बना सके थे लेकिन एक हैंडग्रेनेड की व्यवस्था उन्होंने जरूर कर ली थी, लेकिन इनमें से एक क्रांतिकारी के पुलिसकर्मी भाई ने योजना को लीक कर दिया। इसके बाद चार साथियों सहित उन्हें जेल जाना पड़ा। साथ ही अंग्रेजों की कठोर यातनाएं सहनी पड़ी।
उनका इरादा इतना पक्का था कि अगर हैंडग्रेनेड से गवर्नर को नहीं उड़ा पाए तो इसे अंग्रेजों के हाथ में भी नहीं सौंपेंगे। लिहाजा दशकों बाद यह हैंड ग्रेनेड आज भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी साधूराम के बेटे चंद्र प्रकाश के पास सुरक्षित है। चंद्रप्रकाश के अनुसार, युवावस्था में कदम रखते ही उनके पिता साधूराम में देश को अंग्रेजों से आजाद कराने का जज्बा भर गया। साधूराम ने नन्हेड़ा गांव के आत्माराम, लाडवा के डॉ. विष्णु दत्त शर्मा, मुरादगढ़ के पंडित मूलचंद, धनौरा के मामराज, पटहेड़ा के रामदिया, कृष्ण लाल, रामप्रसाद अल्हावर आदि के साथ आजादी के लिए अंग्रेजी हुकूमत के साथ बगावत शुरू की थी।
आवाज उठाने पर कठोर कारावास और 50 रुपये जुर्माने की सजा मिली
चंद्रप्रकाश ने बताया कि उनके पिता ने 1930 में एक गुप्त बैठक में जलियांवाला बाग हत्याकांड सहित गोरी हुकूमत के बढ़ते जुल्मों सितम के खिलाफ मजबूत कार्ययोजना पर चर्चा की। गांव-गांव जाकर लोगों को जोड़ा गया। 1935 में खेड़ा गांव में ही साधूराम की अध्यक्षता में कांग्रेस की बड़ी सभा की गई। 11 जनवरी 1941 को नन्हेड़ा गांव में आत्माराम के संयोजन में सभा की गई, जिसमें रामप्रसाद अलाहर का भाषण खत्म होते ही आत्माराम व रामप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया। छह महीने की सजा भी हुई, लेकिन एक महीने बाद 11 फरवरी को यहीं पर फिर सभा की गई। जिसमें रोहतक के चौधरी रणवीर सिंह हुड्डा व कुरुक्षेत्र के बनारसी दास आदि कई क्रांतिकारी शामिल हुए। सभा खत्म हुई तो साधूराम को गिरफ्तार किया गया। उन्हें छह महीने की कठोर कारावास व 50 रुपये का जुर्माने की सजा मिली। उन्हें पहले तिहाड़ जेल, फिर फिरोजपुर जेल स्थानांतरित किया गया। यहां अन्य साथी भी मिल गए।
साधूराम को मिली थी बम फेंकने की जिम्मेदारी
जेल से साधूराम को रिहा होने पर सूचना मिली कि 18 नवंबर 1942 को पंजाब का गवर्नर करनाल आने वाला है। इसके बाद क्रांतिकारियों की बैठक हुई और तय किया गया कि गवर्नर को बम से उड़ा दिया जाए। बम उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी डॉ. कृष्णा को तो बम फेंकने की जिम्मेदारी साधूराम को सौंपी गई। योजना लीक होने के बाद साधुराम, विष्णु दत्त, आत्मा राम, मुंशीराम, रामप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया।