डॉ. सौभाग्य कौशिक
करनाल। जिले में मिर्गी के मरीजों की बढ़ती संख्या चिंता बढ़ा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि मिर्गी पूरी तरह नियंत्रित हो सकती है, लेकिन समय से इलाज शुरू होना चाहिए। जिला अस्पताल की मानसिक ओपीडी में आने वाले मिर्गी के मरीजों में युवाओं की संख्या अधिक है। युवाओं में मिर्गी तेजी से बढ़ने के पीछे तनाव, देर रात तक मोबाइल और लैपटॉप के इस्तेमाल, नींद की कमी और शराब जैसे कारक मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं।
कई युवा दौरे को छुपाते हैं, जिससे इलाज और देर से शुरू होता है। डॉक्टरों ने बताया कि दवा नियमित नहीं लेने, सिर की चोट और अनियमित दिनचर्या से भी दौरे बढ़ जाते हैं। कई मामलों में जन्मजात या संक्रमण के बाद की दिक्कतें भी युवाओं में मिर्गी की वजह बनती हैं। जिला नागरिक अस्पताल से मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. सौभाग्य कौशिक ने बताया कि जिला नागरिक अस्पताल की मनोरोग ओपीडी में आने वाले मिर्गी के मरीजों में 70 प्रतिशत मरीज 25 वर्ष से कम आयु के हैं। 15 प्रतिशत 25 से 35 वर्ष के हैं। बुजुर्गों में जो वर्षों तक शराब का सेवन करते हैं वे भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। हर सप्ताह 15 से 20 नए मरीज मिर्गी के लक्षणों के साथ मनोरोग ओपीडी में पहुंच रहे हैं। 10 से 15 मरीज फॉलोअप के लिए आते हैं। पूर्व के मुकाबले मामले बढ़े हैं। युवाओं में मिर्गी तेजी से बढ़ने के पीछे तनाव के साथ देर रात तक मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल बड़ा कारण है। नींद की कमी और शराब जैसे कारक भी जिम्मेदार हैं।
दिमाग में कम हो जाता है खून का बहाव
डॉ. सौभाग्य कौशिक ने बताया कि मिर्गी दिमाग की इलेक्ट्रिक एक्टिविटी में असंतुलन के कारण होती है। दिमाग में खून का बहाव अचानक कम होने या नसों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलने पर दौरे पड़ते हैं। सिर पर चोट, तेज बुखार, संक्रमण, तनाव और शराब जैसी आदतें इसे और बढ़ाती हैं।
3 से 5 साल में दवा से उपचार संभव
डॉ. कौशिक के अनुसार यदि मरीज शुरुआत में ही दवाइयों पर भरोसा करें और नियमित फॉलोअप जारी रखें तो 3 से 5 साल में मिर्गी का इलाज पूरी तरह संभव है। अस्पताल में मरीजों को दवा और काउंसिलिंग दोनों के जरिये उपचार दिया जाता है। उन्होंने कहा कि लोगों की सबसे बड़ी गलती यह है कि वे इसे प्रेत-बाधा या झाड़-फूंक से जोड़ लेते हैं और समय पर इलाज नहीं करवाते।