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बच्चों के लिए आंगन, शौचालय न रसोई...ये कैसी आंगनबाड़ी

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करनाल। बच्चों के खेलने के लिए ज्यादातर आंगनबाड़ी केंद्रों में न तो आंगन हैं, न खाना पकाने के लिए रसोई न शौचालय की व्यवस्था है। ऐसे में अभिभावक अपने बच्चों को यहां कैसे भेजेंगे। सरकार योजना के तहत आंगनबाड़ी केंद्रों को प्ले-वे स्कूलों में परिवर्तित करने जा रही है ताकि यहां आने वाले बच्चों को और बेहतर सुविधाएं मिल सकें। लेकिन जिला विभाग ने उन केंद्रों का चयन किया है, जो अपने भवनों में संचालित हैं। यानी जहां जगह भी पर्याप्त है और बच्चों को केंद्र पर मिलने वाली सुविधाएं भी पर्याप्त मिल रही हैं। जबकि किराये के भवनों में चलने वाले छोटे केंद्रों को मूलभूत सुविधाओं की दरकार है।
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अमर उजाला ने शुक्रवार को मुगल कैनाल के पास लगती कॉलोनियों के दो केंद्रों के हालात का जायजा लिया। इनमें से चार चमन के एक केंद्र तो 8 बाई 10 वर्ग फुट के छोटे से कमरे में चल रहा था। जहां 60 बच्चे पंजीकृत हैं। लेकिन कमरे में 15 बच्चों के बैठने की भी जगह नहीं है। वहीं माता वाली गामड़ी का केंद्र एक मंदिर के छोटे हॉल में चल रहा है। दोनों जगह राशन, खिलौने, कर्मी-हेल्पर के बैठने की व्यवस्था इन्हीं कमरों में ही है। केवल इन दो केंद्रों के हालात ऐसे नहीं हैं, सैकड़ों केंद्र ऐसे ही चल रहे हैं। ऐसे में इन केंद्रों के हालात कैसे और कब सुधरेंगे, सरकार की अच्छी योजना के बाद भी ये सवाल उठ रहे हैं।
बरामदे को रसोई के रूप में चल रहे काम
मुगल कैनाल के साथ लगते चार चमन के छोटे से कमरे में चल रहे केंद्र में बच्चों का झूला और कुर्सियां एक तरफ पड़ी थी। महज चार-पांच छोटे बच्चे ही पढ़ रहे थे। केंद्र कर्मी के पीछे ही अनाज व अन्य सामान का ढेर लगा था। जिससे आधा कमरा भरा हुआ था। यहां बच्चे और कर्मी मकान मालिकों के शौचालय का ही इस्तेमाल करते हैं। घर के बरामदे यानी केंद्र के बाहर की जगह को रसोई के रूप में जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जाता है।
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बोले, छह माह से किराया तक नहीं मिला
चार चमन के केंद्र की कर्मी सरोज ने बताया कि उनका केंद्र किराये के कमरे में चल रहा है। छह माह से किराया भी विभाग की ओर से नहीं मिला है। केवल 15 बच्चे ही उनके केंद्र में आते हैं। आंगन, क्लास रूम, रसोई, शौचालय और हेल्पर की उन्हें जरूरत है।
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गोदाम के रूप में छोटे हाल में चल रहा गामड़ी का केंद्र
माता वाली गामड़ी का केंद्र एक मंदिर के छोटे से हॉल के कमरे में चल रहा है। जोकि देखने में गोदाम की तरह लग रहा था। इस कमरे में ही अनाज के अलावा झूले और अन्य सामान बिखरा था। यहां 110 बच्चे पंजीकृत हैं। लेकिन एक बार में 22 से ज्यादा नहीं आ पाते। मंदिर के शौचालय का ही इस्तेमाल बच्चे करते हैं। कोरोना के कारण अभी यहां बच्चे नहीं आ रहे हैं।
बोले, सरकार छोटे केंद्रों का भी रखे ध्यान
माता वाली गामड़ी केंद्र की सहायक शाफिया ने बताया कि उनका वेतन और किराया तो आ रहा है। लेकिन सरकार सुविधाएं और बढ़ाए। छोटे केंद्रों को सुविधाओं की ज्यादा जरूरत है। इनका भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
सरकार ने ग्रामीण केंद्रों का किराया 750 और शहरी का 1000 रुपये कर दिया है। केंद्र उन्हीं जगह पर खोला जाता है, जहां मूलभूत सुविधाएं भी मिलें। ऐसी जगह पर केंद्र नहीं खुल सकता, जहां कोई सुविधा न हो और बच्चे न आ सकें।
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-राजबाला, डीपीओ, महिला एवं बाल विकास विभाग
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