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कोरोना ने कया मजबूर, वकील से बने मजदूर

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कोरोना के चलते जहां लोगों की नौकरी चली गई, वहीं काम-धंधे भी चौपट हो गए। कुछ लोगों के लिए तो दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो गया। ऐसे में अपना पेशा छोड़कर कुछ और काम पकड़ना पड़ा। कुछ ऐसा ही अधिवक्ता राजेश कुमार गौड़ के साथ भी हुआ। पहले वह कोर्ट परिसर में लोगों कोे न्याय दिलाने का काम करते थे, लेकिन अब वह ई-रिक्शा भी चलाते हैं।
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राजेश ने बताया कि कोरोना के चलते जब काम बंद हो गया तो कुछ समय दोस्तों से रुपये लेकर काम चलाया। बार काउंसिल की ओर से एक बार 5000 रुपये भी वकीलों को दिए गए थे, लेकिन मेरा मन नहीं माना और उस सहायता को लेने से मना कर दिया। एक समय हालात इतने खराब हो गए कि घर में दो वक्त के खाने तक के पैसे नहीं बचे। तब किराए पर ई-रिक्शा लेकर चलाना शुरू किया। हालांकि अब रिक्शा रोजमर्रा की जरूरत को पूरा करने के लिए ही चलाता हूं।
वर्ष 2000 में शुरू की वकालत
मई दिवस के अवसर पर कर्ण पार्क में किराए में बढ़ोतरी की मांग के लिए प्रदर्शन कर रहे ऑटो, ई-रिक्शा चालकों के बीच मौजूद अधिवक्ता राजेश कुमार गौड़ ने बताया कि पिछले 40 वर्षों से करनाल में रह रहा हूं। वर्ष 1988 में राजकीय कॉलेज से पहले बैच में इंग्लिश से एमए किया। वर्ष 2000 में वकालत पूरी करने के बाद कचहरी में काम करना शुरू कर दिया। सब कुछ ठीक चल रहा था। चार बार कचहरी में उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव भी लड़ा। पढ़ाई मेरे लिए बहुत मायने रखती है। इसलिए पत्नी रेणू बाला को भी 12वीं के साथ-साथ एलएलबी कराई और बेटा केशव दिल्ली यूनिवर्सिटी से वकालत की पढ़ाई कर रहा है, जो पूरी होने वाली है।
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कानून की देता हूं जानकारी
राजेश ने बताया कि ई-रिक्शा चालकों को कानूनी जानकारी भी देता हूं। उनके बेटे ने भी रिक्शा चलाने पर कभी बुरा नहीं माना। वह हमेशा कहता है कि आप जो भी करेंगे ठीक ही करेंगे। सम्मान से पैसा कमाना ही अच्छा है।
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