संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। दिवाली के पांच त्योहारों की शृंखला इस बार छह दिनों में पूरी होगी। ज्योति पर्व दिवाली की तिथि पर ज्योतिषाचार्य एकमत नहीं हैं। असमंजस की स्थिति बनी हुई है। कोई दिवाली के मुख्य पर्व को 20 अक्तूबर को मनाने की बात कह रहा है, तो अन्य 21 अक्तूबर को श्रेष्ठ मान रहे हैं। दोनों ही तिथियों के पक्ष में विद्वानों के पास अपने-अपने पंचांग और ग्रह स्थिति के आधार पर तर्क भी हैं।
श्री श्याम बाला जी ज्योतिष केंद्र के संचालक पंडित विनोद शास्त्री ने बताया कि दिवाली अमावस्या के दौरान मनाए जाने का विधान है। अमावस्या का अधिकांश प्रभाव 20 अक्तूबर की रात को रहेगा। दिवाली का पर्व निशीथ और प्रदोष काल में होता है, इसलिए इस बार 20 अक्तूबर की रात को लक्ष्मी पूजन करना ही शास्त्र सम्मत होने के साथ साथ अधिक फलदायी भी रहेगा। 21 अक्तूबर की रात तक अमावस्या ही नहीं रहेगी, क्योंकि उस समय प्रतिपदा लग चुकी होगी। उन्होंने बताया कि 20 अक्तूबर को अमावस्या दोपहर 3:44 मिनट से शुरू होगी और इसका समापन 21 अक्तूबर शाम 5:54 मिनट पर हो जाएगा। इस समय तक दिवाली का पर्व मना लेना, संभव नहीं है, क्योंकि ये रात्रि का पर्व है।
आचार्य आशीष सागर ने बताया कि प्रदोष व्यापिनी, सूर्यास्त के बाद त्रिमुहूर्त कार्तिक अमावस्या के दिन दीपावली मनाने की शास्त्राज्ञा है। यह मूल प्रथम वचन है। इस वर्ष संवत् 2082 में 20 अक्तूबर के दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि का समाप्ति काल 3 बजकर 45 मिनट है। अतः चतुर्दशी समाप्ति के साथ ही कार्तिक अमावस्या शुरु होकर अगले दिन 21 अक्तूबर यानी मंगलवार की शाम 5 बजकर 55 मिनट तक व्याप्त है। इससे स्पष्ट होता है कि अगले दिन 21 अक्तूबर को प्रदोषकाल में अमावस तिथि भले ही बहुत ही कम समय के लिए है लेकिन इसके साथ 21 अक्तूबर को ही उदय व्यापिनी भी है, जो कि 20 अक्तूबर को नहीं है। पंजाब, हिमाचल, जम्मू आदि राज्यों में सूर्यास्त लगभग 5 बजकर 45 मिनट पर होगा, जबकि 20 अक्तूबर को अमावस्या पूर्णतया प्रदोष एवं निशीथकाल को व्याप्त कर रही है परंतु फिर भी शास्त्र निर्देशानुसार दीपावली 21 अक्तूबर यानी मंगलवार को ही मनाना शास्त्र सम्मत होगा। उन्होंने बताया कि यदि अमावस्या केवल पहले दिन ही प्रदोषकाल को व्याप्त हो, अगले दिन अमावस्या साढ़े तीन प्रहर से अधिक तक रहे, प्रतिपदा तिथि वृद्विगामिनी होकर तीन प्रहर के उपरान्त समाप्त हो रही हो, तो दूसरे दिन अर्थात् अमावस्या के दिन लक्ष्मी पूजन करना चाहिए। 21 अक्तूबर मंगलवार को अमावस्या शाम 5 बजकर 55 मिनट तक है, जो स्पष्टतः सूर्यास्त के कुछ मिनटों बाद तक है, अर्थात् 3.5 प्रहर से अधिक ही है तथा प्रतिपदा तिथि 08 बजकर 17 मिनट पर समाप्त होने से वृद्धिगामिनी है।
20 अक्तूबर के प्रमुख पूजन मुहूर्त
रूप चौदस स्नान : प्रातः 4:46 से 6:25 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त : 11:48 से 12:34 बजे तक
संध्या पूजा : शाम 5:57 से 7:12 बजे तक
लक्ष्मी पूजा : शाम 7:23 से 8:27 बजे तक
प्रदोषकाल : 5:57 से 8:27 बजे तक
वृषभकाल : 7:23 से 9:22 बजे तक
निशीथ पूजा : रात 11:47 से 12:36 बजे तक
चौघड़िया
अमृत : 6:25 से 7:52 बजे तक
शुभ : 9:18 से 10:45 बजे तक
लाभ : 3:04 से 4:31 बजे तक
अमृत : 4:31 से 5:57 बजे तक
चर : 5:57 से 7:31 बजे तक
लाभ : रात 10:38 से 12:11 बजे तक