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Karnal News: भैंस का टैग टूटा बता दावा रोका, कंपनी को देने होंगे 91 हजार रुपये

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करनाल। भैंस का टैग टूटा होने का हवाला देकर बीमा क्लेम खारिज करना न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को भारी पड़ गया। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कंपनी को सेवा में कोताही और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी मानते हुए किसान के पक्ष में फैसला सुनाते उसे 91 हजार रुपये देने का आदेश दिया।
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करीब ढाई साल सुनवाई के बाद आयोग ने फैसला दिया। आयोग ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के ऐसे ही एक मामले में फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कहा कि बीमा कंपनियां पॉलिसी की शर्तों के आधार पर वास्तविक दावों को खारिज नहीं कर सकतीं, जब तक उनके पास ठोस साक्ष्य न हों।
आयोग के फैसले के अनुसार, गांव खेड़ी नरू निवासी तेजबीर सिंह ने अपनी दुधारू भैंस का न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी से 60 हजार राशि का बीमा कराया था। पॉलिसी 19 जून 2022 से 18 जून 2023 तक वैध थी। सात फरवरी 2023 को भैंस की मौत हो गई। इसके अगले दिन आठ फरवरी को जुंडला के पशु चिकित्सालय में पोस्टमार्टम कराया गया। इसके बाद किसान ने बीमा कंपनी के पास क्लेम प्रस्तुत किया।
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किसान का आरोप था कि कंपनी ने कई बार आग्रह करने के बावजूद क्लेम जारी नहीं किया। बाद में टैग टूटा होने का हवाला देकर दावा खारिज कर दिया गया। अब आयोग ने बीमा कंपनी को 60 हजार रुपये की बीमित राशि नौ प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ 45 दिन में देने के आदेश दिए हैं। इसके अलावा मानसिक परेशानी के लिए 20 हजार और कानूनी खर्च के लिए 11 हजार रुपये देने होंगे।
किसान का तर्क- वीडियो में ठीक लगा दिख रहा
बीमा कंपनी ने आयोग में पक्ष रखते हुए कहा कि जांच के दौरान भैंस का टैग टूटी हुई अवस्था में मिला था। पॉलिसी की शर्त के अनुसार टैग सही-सलामत जमा कराना जरूरी था। कंपनी ने इसी आधार पर क्लेम खारिज करने को उचित ठहराते हुए कहा कि टैग टूटा होने के कारण किसान बीमा राशि पाने का हकदार नहीं है। वहीं किसान ने दावा किया कि कंपनी के सर्वेयर ने मौके पर वीडियोग्राफी की थी और उस समय भैंस पर टैग लगा हुआ था।
आयोग बोला- रिकॉर्ड में टैग नंबर का उल्लेख
आयोग ने मामले में दोनों पक्षों की दलीलें और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का परीक्षण किया। बीमा कंपनी ने टैग टूटने के आधार पर क्लेम खारिज किया था लेकिन दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए। कंपनी ने जांच रिपोर्ट तैयार करने वाले जांचकर्ता को गवाही के लिए पेश नहीं किया और न ही उसका शपथपत्र प्रस्तुत किया। आयोग ने यह भी पाया कि कंपनी की ओर से पेश दस्तावेज की प्रतियां थीं जिन्हें शपथपत्र से समर्थित नहीं किया गया था। ऐसे दस्तावेज को पर्याप्त कानूनी महत्व नहीं दिया जा सकता। रिकॉर्ड में टैग नंबर का उल्लेख भी मौजूद था।
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