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इंग्लैंड की धरती पर गोल्ड जीतने के बाद भी नहीं मिली शाबाशी

Sun, 20 Oct 2013 09:31 PM IST
करनाल
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क्रिकेट की चकाचौंध और सरकार की बेरुखी के चलते कई खेल व प्रतिभावान खिलाड़ी गुमनामी के अंधेरे में खो गए हैं। अगर ऐसे खेलों और खिलाड़ियों को सरकार का थोड़ा भी सहयोग मिलता तो उसमें छुपी भारतीय प्रतिभाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन कर सकती थीं।
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हाल ही में इंग्लैंड में हुई बॉडी बिल्डिंग स्पर्धा के पुलिस विश्व कप में गांव सालवन के संजीव गोस्वामी ने अपनी मेहनत के बूते गोल्ड हासिल कर मिस्टर यूनिवर्स के लिए क्वालिफाई किया, परंतु सरकार की बेरुखी व घरेलू मुफलिसी के चलते संजीव इस प्रतिस्पर्धा में हिस्सा नहीं ले पाया।

केंद्रीय रिजर्व पुलिस के जवान संजीव गोस्वामी ने गांव सालवन में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि हरियाणा सरकार वैसे तो देश की सर्वश्रेष्ठ खेल नीति लागू करने का दम भरती है, परंतु ग्रामीण अंचलों से अपने बूते मुकाम हासिल करने वाले खिलाड़ियों की सुध तक नहीं ली जाती।
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बॉडी बिल्डिंग फुटबाल के बाद विश्व का दूसरा सबसे लोकप्रिय खेल है, परंतु इस खेल को भारतीय खेल कैलेंडर में शामिल नहीं किया गया। खेल को भारतीय कार्यक्रम में शामिल नहीं करने की वजह से लाखों ऐसे खिलाड़ी, जो इस खेल में अपना दमखम दिखाने की इच्छा रखते हैं, पैसों की तंगी व सरकारी सहायता नहीं होने की वजह से बीच रास्ते में ही खेल को छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं।

भारतीय पुलिस खेल कमेटी की ओर से चयनित होने के बाद उन्हाेंने यूके में आयोजित विश्व पुलिस बॉडी बिल्डिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और दुनियाभर के दो सौ खिलाड़ियों को मात देने के बाद 60 किलोग्राम भार वर्ग में देश को गोल्ड दिलवाया। उत्तराखंड व महारष्ट्र के दो खिलाड़ियों ने भी अपने-अपने भार वर्ग में गोल्ड हासिल किया।

उन्हें मायूसी उस वक्त हाथ लगी, जब देश के लिए सोना जीतने के बाद वे अपने घर लौटे तो उन्हें टिकट तक का खर्च मुहैया नहीं करवाया गया जबकि उत्तराखंड व महाराष्ट्र की सरकार ने अपने विजेता खिलाड़ियों को मिस्टर यूनिवर्स में खेलने के लिए प्रायोजित करने के अलावा तीन से पांच लाख का इनाम दिया।

चार लाख खुद खर्च करने के बाद संजीव लौटे तो उसे सीआरपीएफ ने महज दस हजार की इनाम राशि दी, जबकि प्रदेश सरकार के कई चक्कर काटने के बावजूद भी उन्हें झूठा आश्वासन तक नहीं दिया गया।

संजीव के भाई विजय गोस्वामी, सरपंच ओमपाल, पवन राणा, मित्रसेन ने बताया कि संजीव की एक दिन की डाइट का खर्च बारह सौ रुपये है और विभिन्न देशों में आयोजित होने वाली प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने पर उसका खर्च इतना ज्यादा हो गया है कि अब उसके परिजनों ने हाथ खड़े कर दिए हैं।

संजीव ने अब खेल से तौबा करने का मन बना लिया है, जोकि इस क्षेत्र के लिए बेहद निराशा की बात है। सरपंच व ब्लॉक समिति चेयरमैन पवन राणा ने संजीव को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजा है।
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