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गलती छिपाने को वन विभाग पर दोष

Sat, 24 Nov 2012 12:00 PM IST
Karnal
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करनाल। कहते हैं कि एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं। ऐसा ही कुछ कर रहा है करनाल का नगर सुधार मंडल। मुगल कैनाल विवाद को लेकर रोजाना नई बात नगर सुधार मंडल करता है। कभी कहते हैं जमीन उनकी है, कभी वन विभाग ने अनुमति मांगी है, कभी यहां मुगल कैनाल फेज दो मार्केट विकसित की जा रही है और अब नया सिगूफा की मुगल कैनाल के नाले को ढकने भर का प्रस्ताव है। अगर पर्यावरण मंत्रालय अनुमति देगा, तो ही फेज दो का विस्तार होगा।
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इन सारे बयानों से साफ है कि जमीन वन विभाग की है और इसमें वानिकी के अलावा कोई कार्य करने के लिए अनुमति चाहिए। यह सुधार मंडल भी अपने ही प्रेस विज्ञप्ति में मान रहा है, लेकिन फिर भी अधिकारी कह रहे हैं कि जमीन पर उनका हक है।

ऐसा सामने आया था सारा मामला
दरअसल, मुगल कैनाल पर पहले से मार्केट है और इसके विस्तार की योजना आते ही यह मामला विवाद में आ गया। क्योंकि जिस जमीन पर यह मार्केट का विस्तार होना है, वह वन विभाग का संरक्षित वन क्षेत्र है। इसके लिए पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति जरूरी है। यह बात जिला उपायुक्त भी अपने कथन में मान चुकी हैं कि उन्होंने अनुमति मांगी है और अनुमति आते ही काम शुरू कर देंगे। पर नगर सुधार मंडल के अधिकारी एवं एसडीएम गिरीश अरोड़ा कहते हैं कि इस जमीन से वन विभाग का कोई सरोकार ही नहीं है। इसी को लेकर रोजाना नया बयान नगर सुधार मंडल की ओर से जारी हो रहा है। यह सारा खुलासा एडवोकेट राजेश शर्मा ने आरटीआई में किया था कि किस तरह से वन संरक्षित क्षेत्र को बेचकर नगर सुधार मंडल पैसा बना रहा है।
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वन विभाग का दावा जमीन पर कब्जा
इस मामले में वन विभाग का दावा है कि नगर सुधार मंडल ने उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया है। इस मामले में वन मंडल अधिकारी करनाल ने ट्रस्ट इंजीनियर करनाल को पत्र लिखकर चेताया था। उन्होंने कहा था कि शहर के सेक्टर-13 एक्सटेंशन के साथ गुजरती ओल्ड बादशाही कैनाल (गंदा नाला) की भूमि पर आपके विभाग ने नाजायज कब्जा करके दुकानों का निर्माण कर लिया है। यह भूमि हरियाणा सरकार के गजट नोटिफिकेशन एसओ 41 सीए 16/27 एस 29/72 दिनांक 3 मार्च 1972 द्वारा आरक्षित वन घोषित की गई है। इस भूमि पर गैर वानिकी कार्य करना वन संरक्षण अधिनियम 1980 भारतीय वन अधिनियम 1927 और माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिट पेटीशन नंबर 202/1995 में दिनांक 16 दिसंबर 1996 को दिए गए आदेश की अवहेलना है। इस बारे में वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत इस वन भूमि को गैर वानिकी कार्य के लिए इस्तेमाल करने के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत करें, अन्यथा इस केस में प्रासीक्यूशन करनी की कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। पत्र की प्रति वन राजिक अधिकारी को भी भेजी गई है। पत्र में कहा गया है कि वह नाजायज कब्जा की गई वन भूमि की पूर्ण सूचना, भूमि की जमाबंदी, गिरदावरी और अक्सीजरा की प्रति तुरंत प्रस्तुत करें, ताकि केस में कार्रवाई की जा सके। वहीं, जितने भी वन क्षेत्र पर अवैध निर्माण किया गया है उसकी भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत क्षति रिपोर्ट जारी करें।

नगर सुधार मंडल का दवा जमीन उनकी
वहीं, नगर सुधार मंडल के ट्रस्ट इंजीनियर का दावा है कि यह भूमि नगर सुधार मंडल की है। इसकी अनापत्ति के लिए सरकार के पास प्रस्ताव भेजा गया है, पर अभी अनुमति नहीं मिली है। फेज-2 विस्तार में नाला ढकने की अनुमति वन विभाग ने दे दी है। पर साथ लगती जमीन पर तभी मार्केट काटी जाएगी, जब अनुमति मिल जाएगी। वहीं, एसडीएम एवं प्राधिकारी नगर सुधार मंडल ने पत्र के माध्यम से कहा है कि इस भूमि से वन विभाग का कोई वास्ता नहीं है। वन विभाग को वर्ष 2010 में ही इसकी याद क्यों आई। पहले वन विभाग कहां था। इस सारे विवाद के बीच यह तो साफ है कि इसमें कहीं ना कहीं खेल हो रहा है। जमीन वन विभाग की है और ऐसा नहीं है, तो अनुमति क्यों मांगी जा रही है।
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